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Friday, December 22, 2017

भारत और भ्रष्टाचार का इतिहास

भारत और भ्रष्टाचार का इतिहास
2जी घोटाले के सभी आरोपी बरी हो गए। भ्रष्टाचार का ये कोई पहला मामला नहीं है और आखिरी भी नहीं होंगा। अदालत का आदेश भी कोई चौकाने वाला नहीं है। भारत में आज तक कभी भी किसी ख़ास आदमी को सजा नहीं हुई है, और शायद कभी होंगी भी नहीं। दुखद है पर यही सचाई है हमारे देश की।

आजादी के बाद राजनीतिक भ्रष्टाचार का पहला आरोप 1948 में ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त वी. के. कृष्ण मेनन पर लगा था। फौज के लिए 2000 जीप खरीदने के लिए एक निजी कंपनी को 80 लाख रुपए का भुगतान कर दिया गया। मगर डिलीवरी सिर्फ 155 जीप की ही हुई। वह कंपनी फर्जी निकली मगर मेनन बेदाग साबित हुए और बाद में रक्षामंत्री भी बने।

1958 में बीमा घोटाला हुआ। जिसमें वित्तमंत्री टी. टी. कृष्णमाचारी, वित्त सचिव एच.एम. पटेल और एलआईसी अध्यक्ष वैद्यनाथन पर आरोप लगे. अगले साल उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया की कंपनी भारत बीमा कंपनी में जनता के जमा 2.2 करोड़ रुपए हड़पने के आरोप लगे। इस कांड ने ही बीमा कारोबार का राष्ट्रीयकरण करवाया।

1960 में धर्म तेजा ने सरकार से जहाजरानी कंपनी शुरू करने के नाम पर 22 करोड़ रूपये का कर्जा लिया ओर विदेश भाग गया।

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के पिता बीजू पटनायक ने 1965 में अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में एक निजी कंपनी कलिंग ट्यूब्स को सरकारी ठेके देने में पक्षपात के आरोप में इस्तीफा देना पड़ा था.

इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में नागरवाला बैंक घोटाले, मारुति उद्योग और कुओ तेल सौदे में उन पर व उनके बेटे संजय गांधी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे.
नागरवाला पर 1970 में स्टेट बैंक में इंदिरा गांधी की आवाज में फोन करके खुद को 60 लाख रुपए देने का आदेश सुनाने और फिर जाकर वह रकम निकाल लेने का आरोप लगा. यह कांड अंत तक अनसुलझा रहा क्योंकि मामले के जांच अधिकारी तथा नागरवाला दोनों की ही संदिग्ध मौत हो गई.

मारुति उद्योग दरअसल संजय गांधी ने हरियाणा में खोला था जिसे कार बनाने का लाइसेंस और सरकारी कर्ज व जमीन दिलाने में पक्षपात का आरोप प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर लगा। आपातकाल की ज्यादतियां जांचने को बने शाह आयोग ने भी इसे भ्रष्टाचार करार दिया था.

कुओ तेल घोटाला हांगकांग की कुओ तेल कंपनी से कच्चा तेल की भविष्य में डिलीवरी लेने के लिए तत्कालीन दाम पर उसे 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर का ठेका दिया गया.

अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल का दाम चूंकि घटता-बढ़ता रहता है इसलिए इस सौदे में सरकार को 13 करोड़ रुपए का चूना लगा। यह रकम इंदिरा-संजय के विदेशी खातों में जमा होने का आरोप तो लगा मगर साबित कुछ नहीं हुआ।

थाल वैशेट तेल परियोजना का ठेका इतालवी स्नैमप्रोगेटी कंपनी की सहायक कंपनी को नियम तोड़ कर देने का आरोप 1980 में कांग्रेस की सरकार पर लगा.

महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री ए.आर. अंतुले पर सीमेंट का कोटा जारी करने के बदले बिल्डरों से धन वसूलने के आरोप लगे. यह वसूली अंतुले इंदिरा प्रतिभा प्रतिष्ठान ट्रस्ट के लिए चंदे के रूप में वसूलते थे. उन्हें अंतत: पद से इस्तीफा देना पड़ा.

बोफोर्स और एचडीडब्लू पनडुब्बी कांड में राजीव पर आरोप लगे. प्रधानमंत्री नरसिंह राव के राज में 1991 में जैन हवाला कांड हुआ जिसमें पक्ष और विपक्ष दोनों के ही शीर्ष नेताओं पर काला धन लेने के आरोप लगे. अदालत ने अपर्याप्त सबूतो के कारण सबको बरी कर दिया।

बिहार में 1000 करोड़ रुपए का चारा घोटाला पकड़ा गया जिसमें राज्य के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों लालूप्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्र सहित आधा दर्जन नेता और नौकरशाह सजा पा चुके हैं। पर वो सब जमानत पर बाहर है और आराम की जिन्दगी जी रहे है। क्या लालू यादव को देख कर लगता है की उन्हें सजा मिली हुई है? और वो 1000 करोड़ रुपए क्या सरकारी खजाने में जमा हुए?

नरसिंह राव सरकार(मनमोहन सिंह वित्तमंत्री) ने ही आर्थिक उदारीकरण किया जिसके बाद से घोटालों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा। नरसिंह राव सरकार पर एनआरआई लखूभाई पाठक द्वारा कागज और कागज की लुगदी की सप्लाई का लाइसेंस देने के वायदे पर तांत्रिक चंद्रास्वामी को एक लाख डॉलर दिलवाने का आरोप था. इस मामले से भी राव सरकार 2003 में बरी हो गई।

इसके अलावा हर्षद मेहता-केतन पारेख-सत्यम-भंसाली-कलकत्ता-शेयर-प्रतिभूति घोटाला, हर्षद मेहता द्वारा राव पर एक करोड़ की रिश्वत खाने का आरोप, बीजेपी कार्यकारी अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण रिश्वत कांड, टाट्रा ट्रक घोटाला, अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीद घोटाला, महाराष्ट्र सिंचाई, भुजबल-आदर्श हाउसिंग सोसायटी एवं तेलगी घोटाला, यूपी में ताज हेरिटेज कॉरीडोर-एनआरएचएम-खाद्यान्न घोटाला, हरियाणा में शिक्षक भर्ती घोटाला, केरल में पाम ऑयल आयात-लावलिन तथा सोलर घोटाला, पश्चिम बंगाल-ओडिशा-असम में शारदा चिटफंड घोटाला-नारद स्टिंग कांड, सहारा शेयर घोटाला, आंध्र प्रदेश-कर्नाटक-नोएडा जमीन घोटाले, कर्नाटक-झारखंड-गोवा-छत्तीसगढ़-ओडिशा तथा कोलगेट खनन घोटाले एवं कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, कोयला खान आवंटन, नेशनल हेराल्ड केस आदि लंबी सूची है राजनीतिक भ्रष्टाचार की।

इन तमाम घोटालों के कारण आम जनता के हिस्से के खरबों रुपए घोटालेबाजों की जेब में गए. आम आदमी के खून-पसीने की कमाई पर ये एक राजनितिक डाका ही माना जाएगा। ये करने वाले ज्यादातर नेता ही हैं। पर किसी को सजा नहीं हुई। हालाँकि अब तक लालू यादव, जगन्नाथ मिश्र, ओमप्रकाश चौटाला, मधु कोड़ा और जयललिता सहित महज पांच पूर्व मुख्यमंत्रियों को ही सजा सुनाई गई है। पर सब जमानत पर बाहर है। इन्हें देख कर लगता ही नहीं की ये सजा काट रहे है। किसी भी मामले में घोटाले की रकम की वसूली नहीं हुई। जिसका अर्थ ये है की उस घाटे की भरपाई आम जनता से ही की गई। क्या ये न्याय हुआ?    
  

राजनीतिक भ्रष्टाचार को काबू करने के लिए जयप्रकाश नारायण, और अन्ना हजारे ने आंदोलन चलाया मगर किसी को सफलता नहीं मिली। बल्कि इन आंदोलनों से निकलने वाले ज्यादातर नेता खुद इस भ्रष्टाचार का हिस्सा बन गए। अन्ना का लोकपाल बनाने का सपना उन्हीं के शिष्य अरविंद केजरीवाल ने ठंडे बस्ते में डाल दिया। केंद्र सरकार भी लोकपाल की स्थापना की दिशा में अब तक कुछ भी ठोस नहीं कर पाई। लोकपाल विधेयक 1969, 1971, 1977, 1985, 1989, 1996, 1998, 2001, 2005, 2008, 2011 और 2013 में पेश किया जा चुका है। पर आगे क्या ? पिछले 48 साल से संसद में ही भटक रहा है। 

Wednesday, December 20, 2017

विचारधारा के प्रकार और इनके बीच का फर्क

मेरी किताब “इतिहास और मिलावट” का अंश 

विचारधारा तीन प्रकार की होती है और ये है :
दक्षिणपंथी
वामपंथी
उदारपंथी
दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगो को राष्टवादी, फासिस्ट, हिटलरवादी, कट्टरपंथी, चरमपंथी, पाखंडी, आर्यवादी, सांप्रदायिक कहा जाता है। भारत में तो इन्हें संघी, भाजपाई, नकली देशप्रमी, और हिन्दू आतंकवादी भी कहते है। ये सबसे पुरानी विचारधारा है दुनिया की।
वामपंथी विचारधारा के लोगो को परिवर्तनवादी, मार्क्सवादी, लेनिनवादी, समाजवादी, माओवादी नक्सली आदि कहा जाता है। काल मार्क्स इसके जनक थे और इन लोगो का सबसे पहला सफल प्रयोग रूस में सन 1917 में हुआ था।
उदारपंथी विचारधारा के लोग लोकतंत्र समर्थक, उदारवादी, प्रगतिशील, आधुनिक आदि कई नामो से जाने जाते है। हालाँकि भारत के अन्दर उदारपंथी, वामपंथियों की एक शाखा की तरह से ही संचालित होती है। क्यों की इनका दुश्मन एक ही है दक्षिणपंथी विचारधारा। एक उदाहरण देखते है।
सड़क पर कचरा पड़ा है। दक्षिणपंथी आया। सारा कचरा साफ़ किया। फिर मिडिया को बुला कर अपना काम सब को दिखाने का प्रयास किया। किसी ने देखा किसी ने नहीं देखा।
सड़क पर कचरा पड़ा है। वामपंथी आया। हड़ताल शुरू कर दी। अपने समर्थको को बुला लिया जाम, आगजनी, तोड़फोड़। मिडिया सब कुछ दिखा रहा है। सरकारी सफाई कर्मचारी आए कचरा साफ़ किया। काम पूरा हुआ खूब प्रचार हुआ।
सड़क पर कचरा पड़ा है। उदारपंथी आया। आंदोलन शुरू कर दिया। सरकारी अकर्म्यता(काम ना करने की आदत) का ढोल सब जगह बजाया। मिडिया तो सब कुछ दिखा रहा ही है। उदारपंथी अब प्रसिद्ध हो चुका है। कचरा तो कर्मचारी ही साफ़ करेंगे।
एक और छोटे से उदाहरण से इनका फर्क समझते है। दक्षिणपंथी मानते है सबसे योग्य व्यक्ति राजा बनेगा। वो सब पर शासन करेगा। वामपंथी मानते है की सब लोग समान है तो ना कोई राजा ना कोई प्रजा। इसके लिए ये लोग विभिन्न संगठन बनाते है। जैसे किसान, मजदूर ,कर्मचारी, कामगार, दिहाड़ी मजदूर आदि संगठन। इन संगठनो के प्रधान और दुसरे सदस्य भी होते है। ये सब मिल कर एक आदमी को नियुक्त करते है और वो देश का प्रधान बन जाता है। उदारपंथी मानते है की सब लोग मिल कर एक नेता का चुनाव करे फिर वो नेता नियमित समय तक सब पर राज करे। उस के बाद जनता एक बार फिर से चुनाव करे। पर देखा जाए तो तीनो ही व्यवस्थाओ में एक शासक जरुरी है। मतलब सब लोग समान हैका आदर्श तो खत्म हो ही जाता है। माना की राजा निरंकुश हो सकता है, पर वामपंथी और उदारपंथी व्यवस्था में भी तो राष्टपति या प्रधानमंत्री निरंकुश हो सकता है? अगर क्रूर शासको का जिक्र किया जाये तो दक्षिणपंथी हिटलर, वामपंथी स्टालिन और माओ है। लोकतंत्र में भी आपातकाल लगाना कोई नई बात नहीं है। भारत में भी तो 1977 में इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगाया गया था। क्या जनता अपने शासक को रोक पाई थी? नहीं तो फिर सब समानका आदर्श कहा गया?
 जहाँ तक बात इन विचारधाराओ में दुश्मनी की है तो उसके लिए हमें इतिहास की संक्षेप में जानकारी लेनी पड़ेगी। 1917 रूस में ज़ार शासको का राज था जो दक्षिणपंथी थे। और मार्क्स के आदर्श और समाजवादी विचार जनता को बहुत ही अच्छे लगते थे। एक ऐसा समाज जहाँ सब लोग समान होये विचार हर किसी को पसंद आएगा। आखिकार फ़रवरी 1917 में वामपंथियों ने रूस की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया। और एक नेता और अपना प्रधान चुन लिया। पर सत्ता मिलते ही क्या हुआ? सारे आदर्श हवाहो गए और वो नेता खुद तानाशाह बन गया। आखिरकार अक्तूबर में(सिर्फ 9 महीने बाद) एक रक्तरंजित क्रांति के जरिये उस तानाशाह को हटाया गया और लेनिन को सत्ता दी गई। वामपंथी आदर्श सत्ता सुख के 9 महीनो में ही समानता को छोड़ तानाशाही में तब्दील हो गया। वामपंथियों के इस सफल आन्दोलन के बाद तो ये तेजी से पूरी दुनिया में फैला। और इस फैलाव को रोकने का काम किया हिटलर ने। ये वामपंथ पुरे यूरोप को अपने प्रभाव में ले लेता लेकिन हिटलर इसके मार्ग में दीवार बन गया और वामपंथदक्षिणपंथ के बीच की नफरत बढती ही गई। यही कारण था की पूर्वी यूरोप जो वामपंथ के प्रभाव में थे वो गरीब ही रहे जबकि पश्चिमी यूरोप के लोग धनवान बन गए। हालाकि वो लोग इस के लिए कभी हिटलर का एहसान नहीं मानेगे क्यों की इतिहास में हिटलर का नाम ही इतना बदनाम किया गया है।
भारत में हिटलर को फ़ासीवादी(फासिस्ट) कहा जाता है जबकि हिटलर नाजीवाद का जनक था। फ़ासीवाद का जनक था इटली का मुसोलिनी। परन्तु मुसोलिनी के बारे में भारतीय इतिहास में बहुत कम जानकारी है और इस का कारण ये है की मुसोलिनी इटली का था और वर्तमान काल में भारत की सबसे पुरानी पार्टी की राजमाता खुद इटली की है। साथ ही इनके और उसके पूर्वजो के आपस में सम्बन्ध थे। इसी प्रकार स्टालिन और माओ के बारे में भी नहीं बताया जाता क्यों की ये वामपंथी नेता है। स्टालिन ने तो अपनी ही सेना के आदमियों को मारने का हुक्म दे रखा था और माओ ने तो चीन में लाखो चीनी नागरिको को सिर्फ इसलिए मरवा दिया क्यों की वो लोग उस से असहमत थे। असहमति के मामले में माओ की नीति स्पष्ट थी। आज जो असहमत है कल वो विद्रोही बन सकता है इसलिए उस को खत्म कर दो। माओ ने समाजवाद पर नए सिरे से काम किया। इतना की इसका नाम ही माओवाद पड़ गया। भारत में भी वामपंथियों की दो शाखाये है माओवादी और मार्क्सवादी।
दरअसल एक वक़्त था जब आधी दुनिया पर वामपंथियों का कब्ज़ा था। जिन देशो में ये विपक्ष में थे वहा भी इनकी मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता था। राष्टवादी हाशिये पर धकेल दिए गए थे। और वामपंथी हर जगह अपना दबदबा मजबूत कर रहे थे फिर इन्ही वामपंथियों में से एक शाखा निकली उदारवादियो की। छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी।
भारत  में आजादी के बाद राज वयवस्था छद्म धर्मनिरपेक्षतावादीयों के हाथों में आ गई और पूरी शिक्षा प्रणाली पर इन वामपंथियों ने कब्ज़ा कर लिया । आज भी भारत की पूरी शिक्षा प्रणाली में 70 प्रतिशत तक वामपंथी है। 25-30 प्रतिशत पर छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी। इस लिए इतिहास से मुसोलिनी का फासिस्ट गायब हो गया। माओ के अत्याचार गायब हो गए। स्टालिन की अपने ही सैनिको के प्रति क्रूरता गायब हो गई।
और भी बहुत कुछ गायब हुआ है इतिहास से जो आगे भी बताया जाएगा। पर अगर आप मेरी अभी तक की बातो से सहमत नहीं है तो एक उदाहरण देता है। वर्तमान काल का ही। राजस्थान सरकार ने अपने पाठ्यक्रम में महाराणा प्रताप पर एक अध्याय शामिल किया तो कांग्रेस के ही युवा सांसद ने ये ब्यान दे दिया की संघ अपने लोगो को इतिहास में शामिल कर रहा है। एक उच्च शिक्षित युवा नेता और इस प्रकार का ब्यान? क्या महाराणा प्रताप संघ के आदमी थे? क्या उस काल में संघ था भी? दरअसल महाराणा प्रताप के काल में तो संघ के संस्थापको के पूर्वज भी पैदा नहीं हुए थे। तो वो संघी कैसे हुए? इस प्रकार की और भी बाते आती रहती है। जैसे भगत सिंह आतंकवादी थे। क्यों थे? क्यों की उन्होंने बम विस्फोट किया था। पर इस तर्क के आधार पर तो हर वो आदमी जो बम विस्फोट करता है आतंकवादी होना चहिए फिर आजकल के आतंकवादियों की फांसी माफ़ी के लिए प्रदर्शन क्यों? उन की फांसी का समर्थन करने वाली विचारधारा इनकी फांसी का विरोध क्यों करती है?
 दरअसल छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी जब भी इतिहास लेखन करते है तो अपने पितृ पुरुष की किताब पढ़ते है। जवाहर लाल नेहरू की भारत एक ख़ोज। और वामपंथी अपने पितृ पुरुष काल मार्क्स की किताबे। अब इन किताबो में जो कुछ भी लिखा हुआ है वो सब अटल सत्य है। इस के आलावा समाज में जो कुछ भी है। उस को भी इन किताबो के अनुसार ही संशोधित करने का प्रयास किया जाता है। और फिर भी वो चीज समझ में ना आये तो उसको नकार दो। ख़ारिज कर दो। अंधविश्वास, पाखंड, कुरीति, ब्राहमणवाद, मनुवाद, आडम्बरवाद, सांप्रदायिक जैसे शब्दों से उस चीज को अप्रसांगिक बना दो।

 एक झूठ को 100 बार, हजार बार बोलो, पीढ़ी दर पीढ़ी बोलो लोग सच मानने लगेंगे। और लोग मान भी रहे है। जैसे की भारत के  राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी है। ये बात हर कोई जानता है हमारे पाठ्यक्रम में भी है, पर संविधान में राष्ट्रपिता का कोई पद नहीं है। किसी कानून के जरिये भी उन्हें ये उपाधि नहीं दी गई ये बात कितने लोग जानते है? स्कूली बच्चो के पाठ्यक्रम में भी झूठ? आखिर क्यों?  70 सालो में हम अपनी खुद की शिक्षा प्रणाली तक नहीं बना पाए। ब्रिटिश कालीन शिक्षा प्रणाली आज भी हमें मानसिक गुलाम बनाये हुए है। अंतर सिर्फ ये है की पहले अंग्रेज थे अब वामपंथी है। 

Wednesday, December 6, 2017

भारतीय मिडिया, क्या निष्पक्ष है ?

भारतीय मिडिया, क्या निष्पक्ष है ?

क्या हमारे देश का मिडिया निष्पक्ष है? या ये भेदभावपूर्ण समाचार प्रसारित कर देश का माहौल प्रभावित करने का प्रयास करता है। देश में असहिष्णुता है? तानाशाही है? माहौल ख़राब है? रहने के लायक नहीं है? आज़ादी, निजता, अभिव्यक्ति खतरे में है? आजकल यही बाते बुद्धिजीवी वर्ग की जुबान पर है। समाचार चैनल, समाचार पत्र, पत्रिकाएँ आदि पर छाईं हुई है। पत्रकारिता जगत के सभी लोग इन खबरों को बुलंद करने में लगे हुए है। पर अपनी बात साबित करने के लिए इन लोगों के पास है क्या? पनेसर, कुल्बर्गी और दाभोलकर के अलावा? अब एक चौथा नाम और इस सूची में जुड़ गया है गोरी लंकेश का। ज्यादा जोर देने पर दो और नाम निकल कर आते है अखलाक और जुनैद का। क्या बस यही हत्याएं है? अत्यचार है? क्या इन के आलावा और कोई अपराध नहीं है चर्चा करके के लायक? अपनी बात को और स्पष्ट करता हूँ।
श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु आज भी एक रहस्य है। राजीव दीक्षित की मृत्यु भी रहस्यमयी है। फादर जोजेफ के हाथ काट दिए गए थे। डाक्टर नारंग को उनके ही घर में घुस कर मार डाला गया था। पेटा की महिला कार्यकर्ता को बुरी तरह पीटा गया। बिहार में कुछ दलित युवको को मार-पीट कर पेशाब पिलाया गया। पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या कर दी गई। अलीगड़ विश्वविद्यालय में एक महिला पत्रकार के साथ अभद्रता की गई। एक लेखक और पत्रकार कमलेश तिवारी को एक लेख के कारण जेल में डाल दिया गया। बंगाल में तो राम कृष्ण मिशन के एक पुजारी को नंगा करके पीटा गया। कुछ दलित महिलाओ को भी निवस्त्र करके घुमाया गया। केरल में तो 2000 से 2017 तक 160 लोगो की हत्या की गई है जो एक ही संगठन से जुड़े हुए थे।
क्या ये सब घटनाएँ चर्चा का विषय नहीं है? पर इन घटनाओं का तो नाम तक नहीं लिया जाता। ना तो हमारा बुद्धिजीवी वर्ग इस विषय पर कोई बात करता है। और ना ही पत्रकारिता जगत के लोग इस पर अपना मुहं खोलते है। आखिर क्यों? एक दो लोग हो या फिर एक दो बार की बात हो तो ये मान सकते है की भूल गए। याद नहीं रहा। पर लाखो की संख्या है बुद्धिजीवी वर्ग और पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगो की। क्या किसी को भी ये घटनाएँ याद नहीं है। फिर हर बार सिर्फ तीन घटनाओ की ही चर्चा क्यों होती है? यही सवाल हमारे देश में  पत्रकारिता और बुद्धिजीवी वर्ग की निष्पक्षता पर सवाल लगाता है।
अख़लाक़ की मौत से दुखी हो कर जिस बुद्धिजीवी  ने सबसे पहले अपना पुरस्कार वापिस लौटाया ये वही बुद्धिजीवी था जिसने भोपाल गैस कांड के बाद ये कहा की मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता। इतना ही नहीं इन्होने उसी दिन शाम को वहा अपना कार्यक्रम भी किया। जिस बुद्धिजीवी को हजारो लोगो की मौत से फर्क नहीं पड़ा वो एक आदमी की हत्या से इतना दुखी हो गया? फिर कुछ समय बाद डॉ नारंग की भी हत्या कर दी गई परन्तु इस मानवतावादी बुद्धिजीवी ने एक शब्द नहीं कहा। क्यों? अख़लाक़  को लोगो की भीड़ ने मारा, उसके ही घर में, एक मामूली विवाद पर। पर डॉ नारंग की हत्या भी एक समूह ने की, उसके ही घर पर की, उसकी पत्नी और मासूम बेटे के सामने, एक मामूली विवाद पर। क्या फर्क है दोनों घटनाओं में? पर एक खबर को राष्टीय खबर बना दिया गया। दर्जनों पुरस्कार वापस किए गए। संयुक्त राष्ट संघ को पत्र लिखे गए। परन्तु दूसरी खबर? कहा दब गई या दबा दी गई? क्या ये निष्पक्षता की कोई नई परिभाषा है?
भारत के एक बहुत बड़े राष्टीय समाचार पत्र ने अभी हाल ही में एक आवरण कथा प्रस्तुत की जिसमे पनेसर, कुल्बर्गी और दाभोलकर की मामले की प्रगति रिपोर्ट पेश की गई। परन्तु डॉ नारंग का नाम तक नहीं लिया किसी ने। चलो मान लिया की ये एक मामूली आदमी था तो पत्रकार राजदेव रंजन के मामले की प्रगति रिपोर्ट ही शामिल कर लेते अपनी आवरण कथा में। कभी शास्त्री जी या राजीव दीक्षित की रहस्यमयी मौत पर भी कोई खोज पूर्ण आवरण कथा प्रस्तुत कर देनी चाहिये। 17 सालो में 160 हत्या ये भी एक अच्छा विषय है आवरण कथा बनने के लिए। इस समाचार पत्र ने अपनी वेबसाइट पर पदमावती पर भी एक आवरण कथा प्रस्तुत की थी की वो असली महिला थी काल्पनिक पात्र नहीं थी।  परन्तु आज तक वो रिपोर्ट अपने समाचार पत्र में प्रकाशित नहीं की, बल्कि उसको अपनी वेबसाइट से भी हटा दिया। क्या इस प्रकार ये समाचार पत्र अपने निष्पक्षता के दावे को सिद्ध करता है? दुसरे समाचार पत्रों, पत्रिकाओ और समाचार चैनलों का भी यही हाल है।
जब छोटा राजन जैसे अपराधी को पकड़ा गया तो पूरा बुद्धिजीवी वर्ग और पत्रकारिता जगत लग गया “हिन्दू डॉन” शब्द ले कर उसका प्रचार करने। हर समाचार पत्र, हर पत्रिका, हर चैनल “हिन्दू डॉन” शब्द का प्रयोग करता रहा। ऐसा लग रहा था की उस अपराधी का पूरा नाम ही “हिन्दू डॉन छोटा राजन” हो। जबकि अबू सलेम के मामले में किसी ने “मुस्लिम डॉन अबू सलेम” का प्रयोग नहीं किया? अगर हिन्दू होने के कारण राजन के नाम के साथ “हिन्दू डॉन” का प्रयोग करना जायज है तो अबू सलेम, छोटा शकील, और दाउद इब्राहीम के नाम के आगे “मुस्लिम डॉन” का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता? इसी तर्ज पर प्रज्ञा, असीमानंद, पुरोहित जैसे हिन्दू नामो के कारण अगर हिन्दू आतंकवाद को मान्यता मिल सकती है तो लादेन, जवाहिरी, अफजल, याकूब आदि नामो के कारण “मुस्लिम आतंकवाद” या “इस्लामिक आतंकवाद” को मान्यता क्यों नहीं देता हमारे देश का निष्पक्ष बुद्धिजीवी और पत्रकारिता वर्ग?
          हम सब जानते है की जब भी कोई आतंकवादी हमला होता है या कोई आतंकी खुद अपने काम को अल्लहा, खुदा, इस्लाम, जेहाद या इस्लामिक राज्य से जोड़ भी दे तो भी हमारे देश का यही वर्ग पूरा जोर लगा देते है की आतंक का कोई धर्म नहीं होता, धर्म आतंक नहीं सीखाता आदि-आदि। इसी वर्ग के सामने जब तत्कालीन सरकार “हिन्दू आतंकवाद” शब्द की रचना कर रही थी तब इन्होने विरोध क्यों नहीं किया? कोई मार्च नहीं निकाला, पुरस्कार नहीं लौटाए। आखिर ये किस प्रकार की निष्पक्षता है? अगर आतंकवाद इस्लामिक नहीं होता, मुस्लिम नहीं होता तो फिर हिन्दू कैसे हो सकता है? हर वो पत्रकार या बुद्धिजीवी जो मुस्लिम आतंकवाद शब्द का विरोध करता है वो हिन्दू आतंकवाद शब्द पर चुप क्यों रह जाता है?
सरकार का क्या काम होता है। अवैध काम को रोकना। अवैध मानव तस्करी, अवैध शराब, अवैध अड्डे आदि। हर वो काम जो अवैध है उसको रोकना, बंद करना, उस काम से जुड़े लोगो को सजा दिलवाना ये हर सरकार का काम है। हमने कभी ये बहस होते हुए नहीं देखी की सरकार ने अवैध शराब का काम बंद करवा दिया जिस कारण हजारो लोग बेरोजगार हो गए। कभी आपने सुना है की कोई अवैध धंधा बंद होने पर उस से जुड़े लोगो के बेरोजगार हो जाने पर बहस हुई हो? या इस वजह से सरकार पर वो अवैध काम फिर से शुरू करने का दबाव बनाया गया हो? नहीं ना। तो फिर जब उत्तरप्रदेश सरकार ने अवैध बुचडखाने बंद किये तो पत्रकार या बुद्धिजीवी किसलिए इतना शोर मचा रहे थे? खुद अपने मुहँ से कह रहे थे अवैध बुचडखाने और फिर इन को बंद करने पर बेरोजगारी संकट का रोना भी रो रहे थे। आखिर क्या चाहते थे ये लोग। ये खबर महीनो तक सुर्खियों में रही। सरकार को खलनायक की तरह प्रस्तुत किया हमारे देश के पत्रकारो और बुद्धिजीवीयों ने।
अमरनाथ यात्रियों पर जब हमला हुआ तो सरकार ने पीड़ित पक्ष और आरोपी पक्ष का धर्म सार्वजानिक कर दिया। इस पर एक मशहूर पत्रकार और फिल्म निर्माता ने एक लेख में बताया की पत्रकारिता जगत में एक अलिखित नियम होता था की पीड़ित और आरोपी का धर्म ना बताया जाए ताकि भाई चारा ख़राब ना हो। पर वो ये बताना भूल गए की ये नियम कब था क्यों की गुजरात के दंगो से लेकर अख़लाक़ की मौत तक पूरा पत्रकारिता जगत पीड़ित और आरोपी पक्ष का धर्म बार-बार बताते रहे थे। जब ये बात याद नहीं आई की पीड़ित का धर्म सार्वजानिक ना किया जाए। ऊपर लिखी तीन घटनाओ में भी आरोपी पक्ष का धर्म ही बार–बार बताया जाता है की वो हिन्दू है, पर बाकि की जो खबरे मैंने लिखी है और जिन्हे दबा दिया गया है उन पर नहीं बताया जाता की आरोपी पक्ष मुस्लिम है। गुजरात दंगो में आरोपी किस धर्म के है ये बात तो हम 2002 से सुन रहे है। पर मालदा, पूर्णिया और बंगाल के दंगो में आरोपी किस मजहब के है ये नहीं बताया जाता। गुजरात में किसी दलित की पिटाई राष्टीय आपदा बन जाती है पर बिहार में किसी दलित की पिटाई करके उसको यूरिन(मूत्र) पिलाना एक मामूली सी घटना ही मानी जाएगी क्यों की दोनों घटनाओ में पीड़ित पक्ष तो एक ही समुदाय से है परन्तु आरोपी अलग है गुजरात में आरोपी हिन्दू थे तो बिहार में मुस्लिम।
अभी हाल ही में एक समाचार पत्र में उना की ही सकारात्मक तस्वीर प्रकाशित हुई थी परन्तु उस तस्वीर के नीचे जो लिखा था वो अस्वीकार्य था। लिखा था “दलितों की पिटाई के लिए मशहूर गुजरात का उना”। क्या पहचान दे दी उस समाचार पत्र ने गुजरात के उना को? लगता है की उना में तो सिर्फ दलितों की पिटाई ही होती है। अगर ये निष्पक्षता है तो भेदभाव क्या होंगा? इस भेदभाव और पक्षपात पूर्ण समाचारों के एक और उदाहरण दे कर मैं अपना लेख समाप्त करता हूँ। अभी कुल 3 नकली ढोंगी बाबाओ को पकड़ा गया है तो पत्रकारिता जगत इस विषय को उछाल रहा है की सारे बाबा ढोंगी होते है। चोर होते है। सब को जेल में डाल दो आदि। सिर्फ 3 की वजह से लगभग 3000 बाबा दोषी घोषित कर दिए। इसी तर्ज पर 3 आतंकवादियों(अभी तक साबित नहीं हुआ है) के कारण 100 करोड़ से ज्यादा की हिन्दू आबादी को आतंकी घोषित कर दिया तो फिर 30 आतंकवादियों(न्यायपालिका में साबित हो चुके है सजा मिल चुकी है) के कारण 24 करोड़ मुस्लिम आबादी को आतंकी बोलने का साहस क्यों नहीं दिखाया जाता?  
इसी वजह से लोग आजकल पत्रकारो और बुद्धिजीवीयों पर भरोसा नहीं करते।
आखिर मिडिया इस प्रकार का दोहरा रवैया रख कर क्या साबित करना चाहता है? और इस सब का अंत क्या होंगा? यही ना की लोकतंत्र का चोथा स्तम्भ अपनी विश्वसनीयता खोकर एक दिन गिर जाएगा।   
                                             
                                                         

Tuesday, December 5, 2017

कांग्रेस की लगातार हार, कौन है जिम्मेदार?

कांग्रेस की लगातार हार, कौन है जिम्मेदार?
उत्तर प्रदेश निकाय चुनावो के साथ ही एक और राज्य कांग्रेस के हाथ से निकल गया। ज्यादातर लोग भाजपा को मोदी को या अमित शाह को कांग्रेस के इस पतन का कारण मानते है। कुछ लोग सोनिया गाँधी के पुत्र मोह को भी इस असफलता का कारण मानते है। इसलिए प्रियंका को लाने की मांग करते है।वैसे ही जैसे कुछ साल पहले राहुल को लाने की मांग करते थे। वो आए और तब से लेकर लगातार 27 चुनावों में हार कर अपनी योग्यता का प्रदर्शन कर चुके है।
अगर किसी नेता के नेतृत्व में कोई दल लगातार 27 चुनाव हार जाता है तो उस नेता का राजनितिक जीवन तो खत्म ही हो जाता है। पर कांग्रेस पार्टी तो गाँधी परिवार पर ही जिन्दा है और यही है कांग्रेस के पतन का कारण। दरअसल अपनी हार का कारण कांग्रेस पार्टी चाहे हिन्दुत्व को माने या हिन्दू आतंकवाद को दोष दे , हिन्दू वोटो के ध्रुवीकरण का बहाना बनाए या हिंदू वोटबैंक का राग अलापे कोई फर्क नहीं पड़ता कांग्रेस के पतन की शुरुआत तो उसी दिन हो गई थी जिस दिन इस देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। और गाँधी-नेहरू जैसे नेता मूक दर्शक बने रहे। बहुत ही मंद गति से और सतह के नीचे पतन शुरू हो गया था जो अब तेज हो गया है और नजर भी आने लगा है। उस काल में मिडिया आदि भी तो इतना प्रभावशाली नहीं था। सब कुछ सरकारी नियंत्रण में था। इसलिए कुछ पता नहीं चलता था। भगत सिंह की फासी का विरोध ना करके, और फिर कांग्रेस में ही आंतरिक लोकतंत्र की हत्या कर अपनी कब्र खोद ली।
इतिहास पर नजर डाले 1939, जबलपुर अधिवेशन में बहुमत द्वारा चुने गए सुभाष चंद्र बोस को गाँधी ने अपने कथित प्रभाव का प्रयोग करके इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। ये कांग्रेस पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र की हत्या थी जो गाँधी और नेहरू ने अपनी जिद पूरी करने के लिए की। क्यों की अध्यक्ष पद पर वो अपना आदमी बिठाना चाहते थे। इस के बाद एक बार फिर आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पद के लिए भी अपने प्रिय नेहरू को बनाने के लिए बहुमत का गला घोटा गया।  गांधी ने उस वक़्त बड़े साफ तौर अपना समर्थन नेहरू के पक्ष में जाहिर कर दिया था। भारत का भावी प्रधान मंत्री बनने की उम्मीदवारी की आखिरी तिथि 29 अप्रैल 1946 थी। यह नामांकन 15 राज्यों की कांग्रेस की क्षेत्रीय इकाइयों द्वारा किया जाना था। राज्य की कांग्रेस समिति ने नेहरू के नाम का समर्थन नहीं किया। बल्कि 15 में से 12 राज्यों से सरदार पटेल का नाम कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित किया गया। बाकी 3 राज्यों ने किसी का भी नाम आगे नहीं आया। स्पष्ट है कि सरदार पटेल के पास निर्विवाद समर्थन हासिल था जो उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने के लिए पर्याप्त था। इसे गांधी ने एक चुनौती के तौर पर लिया।  
सरदार पटेल की जगह  नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बना कर पार्टी में परिवारवाद और वंशवाद की नीव डाल दी। और इस तरह कांग्रेस का पतन निश्चित कर दिया। दरअसल वो काल जिसे हम कांग्रेस का स्वर्ण काल कहते है वो इसलिए की इस पार्टी का कोई विकल्प ही नहीं था। कोई नेता नहीं था। कांग्रेस गाँधी-नेहरू परिवार की छवि में जकड गई है। इस के बाद इंदिरा नेहरू जो फिरोज खान से विवाह कर के इंदिरा गाँधी बन गई थी(फिरोज खान को नेहरू पसंद नहीं करते थे इसलिए गाँधी जी ने फिरोज को क़ानूनी तौर पर गोद ले लिया और इस प्रकार फिरोज खान फिरोज गाँधी बन गया। और नेहरू की आपति भी खत्म हो गई) और इस प्रकार गाँधी नेहरू नाम अब सिर्फ गाँधी परिवार बन गया। दरअसल कांग्रेस की समस्या ही यही है की ये सिर्फ एक परिवार पर ही निर्भर है। कांग्रेस प्रमुख का पद एक ही वंश के लिए आरक्षित है। अगर ऐसा नहीं है तो कोई बाते की सीताराम केसरी के कांग्रेस अध्यक्ष रहते दो चुनाव हुए जिस में कांग्रेस हारी नतीजा उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। जबकि सोनिया-राहुल के नेत्रत्व में कांग्रेस 24 चुनाव हार चुकी है।
किसे निकाला गया है पार्टी से बाहर? वो सभी कांग्रेसी नेता जो राहुल-प्रियंका को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की मांग कर रहे है वो जरा बताए की कांग्रेस के बाकि नेता क्या योग्य नहीं  है? अहमद पटेल, कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद, गोपाल कृष्ण गाँधी, अनिल शास्त्री, अभिषेक मनु सिंघवी आदि नेता क्या कांग्रेस में साफ़-सफाई का काम करते है? क्या इनमे कांग्रेस अध्यक्ष बनने की योग्यता नहीं है? कांग्रेस के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार राहुल का राजनितिक जीवन 13 साल पुराना है जिसमे उसने 31 चुनावों ने कांग्रेस का नेतृत्व किया है और 23 चुनावो ने कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। इस प्रदर्शन के बाद तो कोई दूसरी कोई पार्टी राहुल को एक कार्यकर्ता का पद ही देती पर कांग्रेस सिर्फ गाँधी उपनाम के कारण पार्टी का अध्यक्ष पद दे रही है।
क्या मणिशंकर अय्यर, अहमद पटेल जैसे नेता जो क्रमशः 28 साल और 40 साल से कांग्रेस की सेवा कर रहे है वो इस पद के लायक नहीं है? 13 साल का अनुभव 40 साल पर भारी है? 23 चुनावी हार 1977 की जीत (इंदिरा विरोधी लहर के बावजूद) पर भारी है? क्या अनिल शास्त्री जो राहुल की तरह पूर्व प्रधानमंत्री के पुत्र है और 28 साल के अनुभवी है, वो योग्य नहीं है कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए? यही है असली वंशवाद। परिवारवाद। राहुल की मंदबुद्धि और बेवकूफ वाली छवि को तो कांग्रेस बीजेपी और संघ का सुनियोजित प्रचार बता कर ख़ारिज कर देती है, पर 23 चुनावी हारो का किस तरह से बचाव करेगी? कांग्रेस पहले अपनी पार्टी के अन्दर लोकतंत्र की स्थापना करे, फिर देश के लोकतंत्र की चिंता करे। जब तक कांग्रेस में एक परिवार की चापलूसी बंद नहीं होगी उसका हाल यही रहेगा। अभी आप के पास राहुल है , प्रियंका है फिर उसके बच्चे रोहन और रेहान है। मजे की बात ये की इनके नाम के पीछे भी वाड्रा की जगह गाँधी ही लगता है।





                

Monday, November 20, 2017

राहुल की ताजपोशी? क्या लोकतंत्र है?

क्या ये ख़बर पहले पृष्ठ का मुख्य समाचार बनने लायक है? हम सभी जानते है की कांग्रेस नाम की कंपनी में पहला पद हमेशा नेहरू परिवार के लिए आरक्षित है। जो अपने पीछे गाँधी उपनाम लगा कर घुमते है। कांग्रेस के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार राहुल का राजनितिक जीवन 13 साल पुराना है जिसमे उसने 31 चुनावों ने कांग्रेस का नेतृत्व किया है और 23 चुनावो ने कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। इस प्रदर्शन के बाद तो कोई दूसरी कोई पार्टी राहुल को एक कार्यकर्ता का पद ही देती पर कांग्रेस सिर्फ गाँधी उपनाम के कारण पार्टी का अध्यक्ष पद दे रही है। क्या मणिशंकर अय्यर, अहमद पटेल जैसे नेता जो क्रमशः 28 साल और 40 साल से कांग्रेस की सेवा कर रहे है वो इस पद के लायक नहीं है? 13 साल का अनुभव 40 साल पर भारी है? 23 चुनावी हार 1977 की जीत (इंदिरा विरोधी लहर के बावजूद) पर भारी है? क्या अनिल शास्त्री जो राहुल की तरह पूर्व प्रधानमंत्री के पुत्र है और 28 साल के अनुभवी है, वो योग्य नहीं है कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए? यही है असली वंशवाद। परिवारवाद। राहुल की मंदबुद्धि और बेवकूफ वाली छवि को तो कांग्रेस बीजेपी और संघ का सुनियोजित प्रचार बता कर ख़ारिज कर देती है, पर 23 चुनावी हारो का किस तरह से बचाव करेगी? कांग्रेस पहले अपनी पार्टी के अन्दर लोकतंत्र की स्थापना करे, फिर देश के लोकतंत्र की चिंता करे।    
            

Friday, November 10, 2017

गुजरात चुनाव और विपक्ष

गुजरात चुनाव और विपक्ष
गुजरात चुनाव जीतना विपक्ष के लिए बहुत जरुरी है। लेकिन बीजेपी को हराना नामुमकिन है। कांग्रेस ये बात भी जानती है की गुजरात चुनाव में बहुसंख्यक वर्ग के वोट ही निर्णायक होते है इसलिए इस बार अल्पसंख्यक और धार्मिक नारे चुनाव से गायब है। बहुसंख्यक वर्ग को ही पटेल, ओबीसी और दलित के नाम से खंडित किया गया है। अपने धन बल और समर्थको का प्रयोग करके तीन जातीय युवा लडको को राजनेता बनाने का काम हो चुका है। अब ये सब अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे और फिर चुनाव के बाद गठबंधन कर लेंगे। विकास के नाम पर ये चुनाव नहीं लड़ सकते क्यों की ये जानते है की विकास की बात की तो सारे वोट बीजेपी को ही जाएगे। इसलिए गुजरात चुनाव को जातीय चुनाव बनाने का षडयंत्र रचा गया है। मतदान के दिन एक और खेल खेला जाएगा। विपक्ष पहले ही चुनाव आयोग और वोटिंग मशीनों की विश्वसनीयता को ख़राब करने का खेल रच चुका है। अब उस को गुजरात चुनाव में प्रयोग किया जाएगा।
विपक्ष आम लोगो और अपने आदमियों को खरीदेगा वोट डालने के लिए। ये लोग बीजेपी को जाकर वोट देंगे। वोटिंग मशीन से पर्ची निकलेगी। फिर ये बाहर आ कर पूर्व नियोजित तरीके से वहा मौजूद मिडिया और लोगो के सामने शोर मचाएगे की उसने किसी और को वोट दिया था पर मशीन ने वोट बीजेपी को दे दिया सबूत के रूप में वो पर्ची भी दिखाएगा। और ये खेल कई जगह होंगा। अलग-अलग शहर, गाव, नगर, बूथ आदि पर। शायद हजारों लोगो को इस काम में लगाया जाएगा। ये खबर आग की तरह फैला दी जाएगी। इस तरह कांग्रेस हजारो वोट बीजेपी को दिलवाकर  चुनाव को संदिग्ध बना देंगी। साबित तो कुछ हो नहीं सकता है लेकिन गुजरात की जीत को बीजेपी के विकास या मोदी जी की ईमानदार छवि का कारण ना मान कर मशीनों की हकिंग को जिम्मेदार बना कर पेश करेंगी।  इन्ही में से कुछ लोग अदालत में अपील भी करेंगे। लम्बी-लम्बी तारीखे ले कर इस मामले को 2019 तक खींचा जाएगा। जिस प्रकार अपने कर्मो के कारण कांग्रेस की छवि भ्रष्ट पार्टी की बन गई है उस ही प्रकार वो बीजेपी की छवि अनैतिक पार्टी की बनाने का प्रयास करेगी। वैसे भी हमने हाल ही में पंजाब और उत्तरप्रदेश के चुनावों में देखा। विपक्ष की जीत तो लोकतंत्र की जीत बताई गई और बीजेपी की जीत को वोटिंग मशीन की हेकिंग का नाम दिया गया
अब सब कुछ गुजरात की जनता के हाथ में है वो अपने प्रदेश की कांग्रेस का प्रदेश बना कर जातिवाद की आग में झोकना चाहते है या विकासवाद की राह पर रखना चाहते है। वैसे भी कांग्रेस पार्टी की गुजरातियों से अजीब सी नफरत है। महात्मा गाँधी को दिया गया मान-सम्मान तो सिर्फ उस नाम “गाँधी” को अपने साथ चिपकाए रखने का प्रयास है। क्यों की इस उपनाम के बिना शाही परिवार खत्म हो जाएगा। सरदार पटेल का हक छिना गया। सालो तक जातिगत राजनीती का अखाडा बनाए रखा। गोधरा कांड करवा कर गुजरात को दंगो की आग में झोक दिया। अब अभी हाल ही में पटेल आंदोलन के नाम पर फिर से गुजरात में आग लगवा दी। गुजरात की जिस पीढ़ी ने कभी धारा 144 नहीं देखी थी उस को कर्फ्यू दिया दिया इस कांग्रेस ने। और ये विपक्ष के मन में गुजरात से नफरत के कुछ उदाहरण है। और अब पूरा विपक्ष विकासशील गुजरात को जातीवादी गुजरात बनाने का प्रयास कर रहे है।                              

Tuesday, October 10, 2017

न्यूटन फिल्म को आस्कर नहीं मिलेगा

न्यूटन फिल्म को आस्कर नहीं मिलेगा। बाहुबली 2 ही सही दावेदार थी आस्कर अवार्ड की। इस फिल्म की सफलता ही आस्कर चयन सिमिति के सदस्यों को पूरी फिल्म देखने के लिए मजबूर कर देती और फिल्म देखने के बाद तो अवार्ड पक्का था। पर सरकार ने अपनी पुरानी प्रथा को ही निभाया। एक कमतर और कमजोर फिल्म को आस्कर में भेज कर। वैसे भी अवार्ड हमेशा उन फिल्मो को ही मिलता है (कुछ अपवाद छोड़ कर) जिन्हें दर्शक नहीं मिलते। सरकार चाहे तो अवार्ड खरीद सकती है। पुरवर्ती सरकारों ने तो कई बार अपने लिए या अपनों के लिए अवार्ड ख़रीदे ही है। जैसे तत्कालीन कांग्रेसी सरकार ने वामपंथी दबाव में आकर  नोबल अवार्ड ख़रीदा था या एक महिला लेखिका के लिए बुकर अवार्ड ख़रीदा था। भारत के दो प्रधानमंत्रियो ने तो खुद को ही भारत रत्न अवार्ड दिया था। 2 दर्जन से ज्यादा अवार्ड तो अभी वापस भी आये है जो सरकारों ने खैरात में बाटें थे। चलो चलता है। अभी तक नहीं मिला तो इस बार नहीं मिलेगा तो क्या फर्क पड़ता है।            

Wednesday, October 4, 2017

बालीवूड बेहाल, लेखको का बुरा हाल

जब तक भारतीय फिल्म उद्योग या बालीवूड में लेखकों को सितारा हैसियत प्राप्त थी केवल तब तक ही भारतीय फिल्मे सफलता का इतिहास रचती थी। सलीम-जावेद की जोड़ी को यही सितारा हैसियत प्राप्त थी। मान-सम्मान, धनआदि सब कुछ मिलता था तो उनके द्वारा लिखित फिल्मो ने अकल्पनीय  सफलता  प्राप्त की उस वक़्त और भी कई लेखक थे जैसे हसरत जयपुरी, साहिर लुधियानवी, प्रदीप, आदि जैसे हजारो नाम है। ये सब इतने सफल इसलिए हुए क्यों की इन्हें अपने काम में इज्जत मिलती थी जबकि आज कल तो नायक का कोई सहायक भी लेखक को धमका देता है। निर्माता, निर्देशक सितारे के आगे लेखक को कुछ समझते ही नहीं । तो लेखको की इस बेकद्री का नतीजा भी हम देख रहे है। एक के बाद एक असफल फिल्म। लगता है जैसे असफल फिल्म बनाने की होड़ लगी है। लेखको से कर्मचारी की  तरह काम करवाया जाएगा तो यही होंगा उपर से ये फिल्म यूनियन इस ने तो लेखको को मजदूर ही बना दिया।
दरअसल बालीवूड में लेखक बनने के लिए इन वामपंथी यूनियनों का सदस्य बनना ही पड़ता है। फिर इनके ही सिकंजे ने फसे फिल्म संस्थानों से प्रशिक्षण लो तब जा कर लेखक बनो। अब एक संगठन से एक संस्थान से एक ही विचारधारा के लोग लेखक बनेगे तो फिल्मे भी एक जैसी ही बनेगी और उनका हश्र भी एक जैसा ही होंगा। गैर परंपरागत, हिंदी में लिखने वाले छोटे शहरों के नए लेखको को तो कोई निर्माता-निर्देशक अपने पास भी नहीं फटकने देता। जबकि हिंदी फिल्म उद्योग का स्वर्ण काल तभी माना जाता है जब हिंदी लेखको का, गैर परंपरागत लेखको का बोल बाला था।

बालीवूड अब कवल तभी बच सकता हिया जब वो इन वामपंथी संगठनो और संस्थानों के मकडजाल से मुक्त हो जाए। हिंदी भाषी और गैर परंपरागत लेखको को देश के कोने कोने से धुंध कर लाया जाए। अपनी जड़ता और नियमो को तोड़ कर हर किसी को मौका देने की आदत डालनी चाहिये बालीवूड को तभी वो बच पाएगा              

Saturday, September 23, 2017

क्या निष्पक्ष है देश का चौथा स्तम्भ?

क्या निष्पक्ष है देश का चौथा स्तम्भ!
देश में असहिष्णुता है? तानाशाही है? माहौल ख़राब है? रहने के लायक नहीं है? आज़ादी, निजता, अभिव्यक्ति खतरे में है? आजकल यही बाते बुद्धिजीवी वर्ग की जुबान पर है। समाचार चैनल, समाचार पत्र, पत्रिकाएँ आदि पर छाईं हुई है। पत्रकारिता जगत के सभी लोग इन खबरों को बुलंद करने में लगे हुए है। पर अपनी बात साबित करने के लिए इन लोगों के पास है क्या? पनेसर, कुल्बर्गी और दाभोलकर के अलावा? अब एक चौथा नाम और इस सूची में जुड़ गया है गोरी लंकेश का। ज्यादा जोर देने पर दो और नाम निकल कर आते है अखलाक और जुनैद का। क्या बस यही हत्याएं है? अत्यचार है? क्या इन के आलावा और कोई अपराध नहीं है चर्चा करके के लायक? अपनी बात को और स्पष्ट करता हूँ।
श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु आज भी एक रहस्य है। राजीव दीक्षित की मृत्यु भी रहस्यमयी है।
फादर जोजेफ के हाथ काट दिए गए थे। डाक्टर नारंग को उनके ही घर में घुस कर मार डाला गया था। पेटा की महिला कार्यकर्ता को बुरी तरह पीटा गया। बिहार में कुछ दलित युवको को मार-पीट कर पेशाब पिलाया गया। पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या कर दी गई। अलीगड़ विश्वविद्यालय में एक महिला पत्रकार के साथ अभद्रता की गई। एक लेखक और पत्रकार कमलेश तिवारी को एक लेख के कारण जेल में डाल दिया गया। बंगाल में तो राम कृष्ण मिशन के एक पुजारी को नंगा करके पीटा गया। कुछ दलित महिलाओ को भी निवस्त्र करके घुमाया गया। केरल में तो 2000 से 2017 तक 160 लोगो की हत्या की गई है जो एक ही संगठन से जुड़े हुए थे।
क्या ये सब घटनाएँ चर्चा का विषय नहीं है? पर इन घटनाओं का तो नाम तक नहीं लिया जाता। ना तो हमारा बुद्धिजीवी वर्ग इस विषय पर कोई बात करता है। और ना ही पत्रकारिता जगत के लोग इस पर अपना मुहं खोलते है। आखिर क्यों? एक दो लोग हो या फिर एक दो बार की बात हो तो ये मान सकते है की भूल गए। याद नहीं रहा। पर लाखो की संख्या है बुद्धिजीवी वर्ग और पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगो की। क्या किसी को भी ये घटनाएँ याद नहीं है। फिर हर बार सिर्फ तीन घटनाओ की ही चर्चा क्यों होती है? यही सवाल हमारे देश में  पत्रकारिता और बुद्धिजीवी वर्ग की निष्पक्षता पर सवाल लगाता है।
अख़लाक़ की मौत से दुखी हो कर जिस बुद्धिजीवी  ने सबसे पहले अपना पुरस्कार वापिस लौटाया ये वही बुद्धिजीवी था जिसने भोपाल गैस कांड के बाद ये कहा की मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता। इतना ही नहीं इन्होने उसी दिन शाम को वहा अपना कार्यक्रम भी किया। जिस बुद्धिजीवी को हजारो लोगो की मौत से फर्क नहीं पड़ा वो एक आदमी की हत्या से इतना दुखी हो गया? फिर कुछ समय बाद डॉ नारंग की भी हत्या कर दी गई परन्तु इस मानवतावादी बुद्धिजीवी ने एक शब्द नहीं कहा। क्यों? अख़लाक़  को लोगो की भीड़ ने मारा, उसके ही घर में, एक मामूली विवाद पर। पर डॉ नारंग की हत्या भी एक समूह ने की, उसके ही घर पर की, उसकी पत्नी और मासूम बेटे के सामने, एक मामूली विवाद पर। क्या फर्क है दोनों घटनाओं में? पर एक खबर को राष्टीय खबर बना दिया गया। दर्जनों पुरस्कार वापस किए गए। संयुक्त राष्ट संघ को पत्र लिखे गए। परन्तु दूसरी खबर? कहा दब गई या दबा दी गई? क्या ये निष्पक्षता की कोई नई परिभाषा है?
भारत के एक बहुत बड़े राष्टीय समाचार पत्र ने अभी हाल ही में एक आवरण कथा प्रस्तुत की जिसमे पनेसर, कुल्बर्गी और दाभोलकर की मामले की प्रगति रिपोर्ट पेश की गई। परन्तु डॉ नारंग का नाम तक नहीं लिया किसी ने। चलो मान लिया की ये एक मामूली आदमी था तो पत्रकार राजदेव रंजन के मामले की प्रगति रिपोर्ट ही शामिल कर लेते अपनी आवरण कथा में। कभी शास्त्री जी या राजीव दीक्षित की रहस्यमयी मौत पर भी कोई खोज पूर्ण आवरण कथा प्रस्तुत कर देनी चाहिये। 17 सालो में 160 हत्या ये भी एक अच्छा विषय है आवरण कथा बनने के लिए। इस समाचार पत्र ने अपनी वेबसाइट पर पदमावती पर भी एक आवरण कथा प्रस्तुत की थी की वो असली महिला थी काल्पनिक पात्र नहीं थी।  परन्तु आज तक वो रिपोर्ट अपने समाचार पत्र में प्रकाशित नहीं की, बल्कि उसको अपनी वेबसाइट से भी हटा दिया। क्या इस प्रकार ये समाचार पत्र अपने निष्पक्षता के दावे को सिद्ध करता है? दुसरे समाचार पत्रों, पत्रिकाओ और समाचार चैनलों का भी यही हाल है।
जब छोटा राजन जैसे अपराधी को पकड़ा गया तो पूरा बुद्धिजीवी वर्ग और पत्रकारिता जगत लग गया “हिन्दू डॉन” शब्द ले कर उसका प्रचार करने। हर समाचार पत्र, हर पत्रिका, हर चैनल “हिन्दू डॉन” शब्द का प्रयोग करता रहा। ऐसा लग रहा था की उस अपराधी का पूरा नाम ही “हिन्दू डॉन छोटा राजन” हो। जबकि अबू सलेम के मामले में किसी ने “मुस्लिम डॉन अबू सलेम” का प्रयोग नहीं किया? अगर हिन्दू होने के कारण राजन के नाम के साथ “हिन्दू डॉन” का प्रयोग करना जायज है तो अबू सलेम, छोटा शकील, और दाउद इब्राहीम के नाम के आगे “मुस्लिम डॉन” का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता? इसी तर्ज पर प्रज्ञा, असीमानंद, पुरोहित जैसे हिन्दू नामो के कारण अगर हिन्दू आतंकवाद को मान्यता मिल सकती है तो लादेन, जवाहिरी, अफजल, याकूब आदि नामो के कारण “मुस्लिम आतंकवाद” या “इस्लामिक आतंकवाद” को मान्यता क्यों नहीं देता हमारे देश का निष्पक्ष बुद्धिजीवी और पत्रकारिता वर्ग?
 हम सब जानते है की जब भी कोई आतंकवादी हमला होता है या कोई आतंकी खुद अपने काम को अल्लहा, खुदा, इस्लाम, जेहाद या इस्लामिक राज्य से जोड़ भी दे तो भी हमारे देश का यही वर्ग पूरा जोर लगा देते है की आतंक का कोई धर्म नहीं होता, धर्म आतंक नहीं सीखाता आदि-आदि। इसी वर्ग के सामने जब तत्कालीन सरकार “हिन्दू आतंकवाद” शब्द की रचना कर रही थी तब इन्होने विरोध क्यों नहीं किया? कोई मार्च नहीं निकाला, पुरस्कार नहीं लौटाए। आखिर ये किस प्रकार की निष्पक्षता है? अगर आतंकवाद इस्लामिक नहीं होता, मुस्लिम नहीं होता तो फिर हिन्दू कैसे हो सकता है? हर वो पत्रकार या बुद्धिजीवी जो मुस्लिम आतंकवाद शब्द का विरोध करता है वो हिन्दू आतंकवाद शब्द पर चुप क्यों रह जाता है?
सरकार का क्या काम होता है। अवैध काम को रोकना। अवैध मानव, अवैध शराब, अवैध अड्डे आदि। हर वो काम जो अवैध है उसको रोकना, बंद करना, उस काम से जुड़े लोगो को सजा दिलवाना ये हर सरकार का काम है। हमने कभी ये बहस होते हुए नहीं देखी की सरकार ने अवैध शराब का काम बंद करवा दिया जिस कारण हजारो लोग बेरोजगार हो गए। कभी आपने सुना है की कोई अवैध धंधा बंद होने पर उस से जुड़े लोगो के बेरोजगार हो जाने पर बहस हुई हो? या इस वजह से सरकार पर वो अवैध काम फिर से शुरू करने का दबाव बनाया गया हो? नहीं ना। तो फिर जब सरकार ने अवैध बुचडखाने बंद किये तो पत्रकार या बुद्धिजीवी किस लिए इतना शोर मचा रहे थे? खुद अपने मुहँ से कह रहे थे अवैध बुचडखाने और फिर इन को बंद करने पर बेरोजगारी संकट का रोना भी रो रहे थे। आखिर क्या चाहते थे ये लोग। ये खबर महीनो तक सुर्खियों में रही। सरकार को खलनायक की तरह प्रस्तुत किया हमारे देश के पत्रकारो और बुद्धिजीवीयों ने।
अमरनाथ यात्रियों पर जब हमला हुआ तो सरकार ने पीड़ित पक्ष और आरोपी पक्ष का धर्म सार्वजानिक कर दिया। इस पर एक मशहूर पत्रकार और फिल्म निर्माता ने एक लेख में बताया की पत्रकारिता जगत में एक अलिखित नियम होता था की पीड़ित और आरोपी का धर्म ना बताया जाए ताकि भाई चारा ख़राब ना हो। पर वो ये बताना भूल गए की ये नियम कब था क्यों की गुजरात के दंगो से लेकर अख़लाक़ की मौत तक पूरा पत्रकारिता जगत पीड़ित और आरोपी पक्ष का धर्म बार-बार बताते रहे थे। जब ये बात याद नहीं आई की पीड़ित का धर्म सार्वजानिक ना किया जाए। ऊपर लिखी तीन घटनाओ में भी आरोपी पक्ष का धर्म ही बार–बार बताया जाता है की वो हिन्दू है, पर बाकि की जो खबरे मैंने लिखी है और जिन्हे दबा दिया गया है उन पर नहीं बताया जाता की आरोपी पक्ष मुस्लिम है। गुजरात दंगो में आरोपी किस धर्म के है ये बात तो हम 2002 से सुन रहे है। पर मालदा, पूर्णिया और बंगाल के दंगो में आरोपी किस मजहब के है ये नहीं बताया जाता। गुजरात में किसी दलित की पिटाई राष्टीय आपदा बन जाती है पर बिहार में किसी दलित की पिटाई करके उसको यूरिन(मूत्र) पिलाना एक मामूली सी घटना ही मानी जाएगी क्यों की दोनों घटनाओ में पीड़ित पक्ष तो एक ही समुदाय से है परन्तु आरोपी अलग है गुजरात में आरोपी हिन्दू थे तो बिहार में मुस्लिम।
अभी हाल ही में एक समाचार पत्र में उना की ही सकारात्मक तस्वीर प्रकाशित हुई थी परन्तु उस तस्वीर के नीचे जो लिखा था वो अस्वीकार्य था। लिखा था “दलितों की पिटाई के लिए मशहूर गुजरात का उना”। क्या पहचान दे दी उस समाचार पत्र ने गुजरात के उना को? लगता है की उना में तो सिर्फ दलितों की पिटाई ही होती है। अगर ये निष्पक्षता है तो भेदभाव क्या होंगा? इस भेद भाव और पक्षपात पूर्ण समाचारों के एक और उदाहरण दे कर मैं अपना लेख समाप्त करता हूँ। अभी कुल 3 नकली ढोंगी बाबाओ को पकड़ा गया है तो पत्रकारिता जगत इस विषय को उछाल रहा है की सारे बाबा ढोंगी होते है। चोर होते है। सब को जेल में डाल दो आदि। सिर्फ 3 की वजह से लगभग 3000 बाबा दोषी घोषित कर दिए। इसी तर्ज पर 3 आतंकवादियों(अभी तक साबित नहीं हुआ है) के कारण 100 करोड़ से ज्यादा की हिन्दू आबादी को आतंकी घोषित कर दिया तो फिर 30 आतंकवादियों(न्यायपालिका में साबित हो चुके है सजा मिल चुकी है) के कारण 24 करोड़ मुस्लिम आबादी को आतंकी बोलने का साहस क्यों नहीं दिखाया जाता?