न्यूटन फिल्म को आस्कर नहीं
मिलेगा। बाहुबली 2 ही सही दावेदार थी आस्कर अवार्ड की। इस फिल्म की सफलता ही आस्कर
चयन सिमिति के सदस्यों को पूरी फिल्म देखने के लिए मजबूर कर देती और फिल्म देखने
के बाद तो अवार्ड पक्का था। पर सरकार ने अपनी पुरानी प्रथा को ही निभाया। एक कमतर
और कमजोर फिल्म को आस्कर में भेज कर। वैसे भी अवार्ड हमेशा उन फिल्मो को ही मिलता
है (कुछ अपवाद छोड़ कर) जिन्हें दर्शक नहीं मिलते। सरकार चाहे तो अवार्ड खरीद सकती
है। पुरवर्ती सरकारों ने तो कई बार अपने लिए या अपनों के लिए अवार्ड ख़रीदे ही है। जैसे
तत्कालीन कांग्रेसी सरकार ने वामपंथी दबाव में आकर नोबल अवार्ड ख़रीदा था या एक महिला लेखिका के लिए
बुकर अवार्ड ख़रीदा था। भारत के दो प्रधानमंत्रियो ने तो खुद को ही भारत रत्न
अवार्ड दिया था। 2 दर्जन से ज्यादा अवार्ड तो अभी वापस भी आये है जो सरकारों ने
खैरात में बाटें थे। चलो चलता है। अभी तक नहीं मिला तो इस बार नहीं मिलेगा तो क्या
फर्क पड़ता है।
Featured Post
समुद्र में पत्थर का पुल कैसे बनाया गया.........???*
*समुद्र में पत्थर का पुल कैसे बनाया गया.........???* लंका के राजदरबार में सन्नाटा था। रावण के सबसे चतुर गुप्तचर , शुक और सारण...
Tuesday, October 10, 2017
Wednesday, October 4, 2017
बालीवूड बेहाल, लेखको का बुरा हाल
जब तक भारतीय फिल्म उद्योग
या बालीवूड में लेखकों को सितारा हैसियत प्राप्त थी केवल तब तक ही भारतीय फिल्मे
सफलता का इतिहास रचती थी। सलीम-जावेद की जोड़ी को यही सितारा हैसियत प्राप्त थी। मान-सम्मान,
धनआदि सब कुछ मिलता था तो उनके द्वारा लिखित फिल्मो ने अकल्पनीय सफलता प्राप्त
की उस वक़्त और भी कई लेखक थे जैसे हसरत जयपुरी, साहिर लुधियानवी, प्रदीप, आदि जैसे
हजारो नाम है। ये सब इतने सफल इसलिए हुए क्यों की इन्हें अपने काम में इज्जत मिलती
थी जबकि आज कल तो नायक का कोई सहायक भी लेखक को धमका देता है। निर्माता, निर्देशक
सितारे के आगे लेखक को कुछ समझते ही नहीं । तो लेखको की इस बेकद्री का नतीजा भी हम
देख रहे है। एक के बाद एक असफल फिल्म। लगता है जैसे असफल फिल्म बनाने की होड़ लगी
है। लेखको से कर्मचारी की तरह काम करवाया
जाएगा तो यही होंगा उपर से ये फिल्म यूनियन इस ने तो लेखको को मजदूर ही बना दिया।
दरअसल बालीवूड में लेखक
बनने के लिए इन वामपंथी यूनियनों का सदस्य बनना ही पड़ता है। फिर इनके ही सिकंजे ने
फसे फिल्म संस्थानों से प्रशिक्षण लो तब जा कर लेखक बनो। अब एक संगठन से एक
संस्थान से एक ही विचारधारा के लोग लेखक बनेगे तो फिल्मे भी एक जैसी ही बनेगी और उनका
हश्र भी एक जैसा ही होंगा। गैर परंपरागत, हिंदी में लिखने वाले छोटे शहरों के नए
लेखको को तो कोई निर्माता-निर्देशक अपने पास भी नहीं फटकने देता। जबकि हिंदी फिल्म
उद्योग का स्वर्ण काल तभी माना जाता है जब हिंदी लेखको का, गैर परंपरागत लेखको का
बोल बाला था।
बालीवूड अब कवल तभी बच सकता
हिया जब वो इन वामपंथी संगठनो और संस्थानों के मकडजाल से मुक्त हो जाए। हिंदी भाषी
और गैर परंपरागत लेखको को देश के कोने कोने से धुंध कर लाया जाए। अपनी जड़ता और
नियमो को तोड़ कर हर किसी को मौका देने की आदत डालनी चाहिये बालीवूड को तभी वो बच
पाएगा
Subscribe to:
Comments (Atom)