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Monday, November 20, 2017

राहुल की ताजपोशी? क्या लोकतंत्र है?

क्या ये ख़बर पहले पृष्ठ का मुख्य समाचार बनने लायक है? हम सभी जानते है की कांग्रेस नाम की कंपनी में पहला पद हमेशा नेहरू परिवार के लिए आरक्षित है। जो अपने पीछे गाँधी उपनाम लगा कर घुमते है। कांग्रेस के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार राहुल का राजनितिक जीवन 13 साल पुराना है जिसमे उसने 31 चुनावों ने कांग्रेस का नेतृत्व किया है और 23 चुनावो ने कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। इस प्रदर्शन के बाद तो कोई दूसरी कोई पार्टी राहुल को एक कार्यकर्ता का पद ही देती पर कांग्रेस सिर्फ गाँधी उपनाम के कारण पार्टी का अध्यक्ष पद दे रही है। क्या मणिशंकर अय्यर, अहमद पटेल जैसे नेता जो क्रमशः 28 साल और 40 साल से कांग्रेस की सेवा कर रहे है वो इस पद के लायक नहीं है? 13 साल का अनुभव 40 साल पर भारी है? 23 चुनावी हार 1977 की जीत (इंदिरा विरोधी लहर के बावजूद) पर भारी है? क्या अनिल शास्त्री जो राहुल की तरह पूर्व प्रधानमंत्री के पुत्र है और 28 साल के अनुभवी है, वो योग्य नहीं है कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए? यही है असली वंशवाद। परिवारवाद। राहुल की मंदबुद्धि और बेवकूफ वाली छवि को तो कांग्रेस बीजेपी और संघ का सुनियोजित प्रचार बता कर ख़ारिज कर देती है, पर 23 चुनावी हारो का किस तरह से बचाव करेगी? कांग्रेस पहले अपनी पार्टी के अन्दर लोकतंत्र की स्थापना करे, फिर देश के लोकतंत्र की चिंता करे।    
            

Friday, November 10, 2017

गुजरात चुनाव और विपक्ष

गुजरात चुनाव और विपक्ष
गुजरात चुनाव जीतना विपक्ष के लिए बहुत जरुरी है। लेकिन बीजेपी को हराना नामुमकिन है। कांग्रेस ये बात भी जानती है की गुजरात चुनाव में बहुसंख्यक वर्ग के वोट ही निर्णायक होते है इसलिए इस बार अल्पसंख्यक और धार्मिक नारे चुनाव से गायब है। बहुसंख्यक वर्ग को ही पटेल, ओबीसी और दलित के नाम से खंडित किया गया है। अपने धन बल और समर्थको का प्रयोग करके तीन जातीय युवा लडको को राजनेता बनाने का काम हो चुका है। अब ये सब अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे और फिर चुनाव के बाद गठबंधन कर लेंगे। विकास के नाम पर ये चुनाव नहीं लड़ सकते क्यों की ये जानते है की विकास की बात की तो सारे वोट बीजेपी को ही जाएगे। इसलिए गुजरात चुनाव को जातीय चुनाव बनाने का षडयंत्र रचा गया है। मतदान के दिन एक और खेल खेला जाएगा। विपक्ष पहले ही चुनाव आयोग और वोटिंग मशीनों की विश्वसनीयता को ख़राब करने का खेल रच चुका है। अब उस को गुजरात चुनाव में प्रयोग किया जाएगा।
विपक्ष आम लोगो और अपने आदमियों को खरीदेगा वोट डालने के लिए। ये लोग बीजेपी को जाकर वोट देंगे। वोटिंग मशीन से पर्ची निकलेगी। फिर ये बाहर आ कर पूर्व नियोजित तरीके से वहा मौजूद मिडिया और लोगो के सामने शोर मचाएगे की उसने किसी और को वोट दिया था पर मशीन ने वोट बीजेपी को दे दिया सबूत के रूप में वो पर्ची भी दिखाएगा। और ये खेल कई जगह होंगा। अलग-अलग शहर, गाव, नगर, बूथ आदि पर। शायद हजारों लोगो को इस काम में लगाया जाएगा। ये खबर आग की तरह फैला दी जाएगी। इस तरह कांग्रेस हजारो वोट बीजेपी को दिलवाकर  चुनाव को संदिग्ध बना देंगी। साबित तो कुछ हो नहीं सकता है लेकिन गुजरात की जीत को बीजेपी के विकास या मोदी जी की ईमानदार छवि का कारण ना मान कर मशीनों की हकिंग को जिम्मेदार बना कर पेश करेंगी।  इन्ही में से कुछ लोग अदालत में अपील भी करेंगे। लम्बी-लम्बी तारीखे ले कर इस मामले को 2019 तक खींचा जाएगा। जिस प्रकार अपने कर्मो के कारण कांग्रेस की छवि भ्रष्ट पार्टी की बन गई है उस ही प्रकार वो बीजेपी की छवि अनैतिक पार्टी की बनाने का प्रयास करेगी। वैसे भी हमने हाल ही में पंजाब और उत्तरप्रदेश के चुनावों में देखा। विपक्ष की जीत तो लोकतंत्र की जीत बताई गई और बीजेपी की जीत को वोटिंग मशीन की हेकिंग का नाम दिया गया
अब सब कुछ गुजरात की जनता के हाथ में है वो अपने प्रदेश की कांग्रेस का प्रदेश बना कर जातिवाद की आग में झोकना चाहते है या विकासवाद की राह पर रखना चाहते है। वैसे भी कांग्रेस पार्टी की गुजरातियों से अजीब सी नफरत है। महात्मा गाँधी को दिया गया मान-सम्मान तो सिर्फ उस नाम “गाँधी” को अपने साथ चिपकाए रखने का प्रयास है। क्यों की इस उपनाम के बिना शाही परिवार खत्म हो जाएगा। सरदार पटेल का हक छिना गया। सालो तक जातिगत राजनीती का अखाडा बनाए रखा। गोधरा कांड करवा कर गुजरात को दंगो की आग में झोक दिया। अब अभी हाल ही में पटेल आंदोलन के नाम पर फिर से गुजरात में आग लगवा दी। गुजरात की जिस पीढ़ी ने कभी धारा 144 नहीं देखी थी उस को कर्फ्यू दिया दिया इस कांग्रेस ने। और ये विपक्ष के मन में गुजरात से नफरत के कुछ उदाहरण है। और अब पूरा विपक्ष विकासशील गुजरात को जातीवादी गुजरात बनाने का प्रयास कर रहे है।