धर्म क्या है? ये सवाल हर इंसान के दिमाग में
हमेशा ही रहता है। धर्म की परिभाषा, धर्म का उदय कब हुआ? धर्म का अंत कब होंगा?
आदि अनगिनत सवाल है, जिनके जवाब हर कोई अलग-अलग देता है। जितने मुहँ उतनी बात। ये
मुहावरा धर्म को परिभाषित करने वालो पर सटीक बैठता है। जैसे सच की परिभाषा हर
व्यक्ति की अलग-अलग होती है, वैसे ही धर्म की परिभाषा भी हर व्यक्ति की अलग-अलग
होती है। दरअसल इसके बारे में कोई भी कुछ खास नहीं बता पाता। आज कल ये सवाल हर कोई
ज्यादा पूछता है की धर्म क्या है? हिन्दू धर्म क्या है? हिन्दुत्व क्या है? कट्टर
हिन्दू क्या है? तो आज मैं इन प्रशनो के उत्तर ही देने का प्रयास करता हूँ। अपने
लेख में मैं रामायण, राम चरित मानस, श्रीमद्भागवत महापुराण और भगवत गीता के ही
संदर्भ प्रयोग करूँगा। पर संस्कृत शलोक और उनके अर्थ अपने लेख में शामिल नहीं
करूँगा। उसके लिए इन ग्रंथो को आप खुद पढ़े ताकि सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सके।
आजकल बहुत लोग मिलते है जो कहते है की हमने गीता
पढ़ी है। कुरान पढ़ी है। बाइबल भी पढ़ी है। सब में एक ही बात है, की सब धर्म समान है।
सब एक है। भगवान एक है। उसके नाम अलग-अलग है। मानवता, इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। समाज
कर्म प्रधान होना चाहिए धर्म प्रधान नहीं। जातिवाद नहीं होना चाहिए। ये सब बाते
दरअसल स्थूल दिमाग की उपज है, जिसे मोटी बुद्धि कह सकते है। ऐसे लोगो ने कुछ पढ़ा
ही नहीं होता। सुनी-सुनाई बातो में आकर अपनी एक विचारधारा बना लेते है और उस पर
अडिग रहते है। जैसे चिकना घड़ा, जितना मर्जी पानी डाल दो एक बूंद भी नहीं टिकेगी।
श्रीमद्भागवत गीता में धर्म-कर्म ज्ञान-विज्ञान ,मानव और समाज का पूरा सविस्तार
वर्णन किया गया है। जो लोग इसे पढ़ लेते है और समझ लेते है उनके मन में इस प्रकार
के प्रशन रहते ही नहीं। जिनके मन में ये सवाल है उन्होंने इसे पढ़ा ही नहीं। वो
सिर्फ इसे पढ़ने का दावा करते है अपने अल्प ज्ञान को छुपा कर ज्ञानी होने का खोखला
दावा है बस ये।
सम्पूर्ण गीता का सार तीन शब्दों में समझा जा
सकता है वो है निष्काम कर्म योग। इसका अर्थ है फल की चिंता किए बिना अपना
कर्म किए जा। आप कहेंगे की अरे ये तो बहुत आसान है। कुछ लोग दावा भी करेंगे की हम
तो ये करते है। आधुनिक काल के माता-पिता कह सकते है की हम हर रोज 15 घंटे काम करके
धन कमाते है, ताकि हमारे बच्चो का भविष्य उज्जवल हो सके। वृद्ध अवस्था में हमारे
बच्चे हमें घर से निकाल भी देंगे, ये हमें पता है फिर भी बच्चो का भविष्य उज्जवल
होना चाहिए। ये है हमारा निष्काम कर्म योग! पर ये नहीं है। फिलहाल निष्काम शब्द को
छोड़ देते है, योग शब्द भी बाद में देखेंगे। सबसे पहले लेते है कर्म।
गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने स्पष्ट शब्दों में
कहा है। बार-बार कहा है की कर्म ही धर्म है। अर्थार्त कर्म और धर्म दो अलग चीज
नहीं है। एक ही है एक इंसान का कर्म ही उसका धर्म है। रामायण में भी श्रीराम ने
कर्म ही किए और उन्हें ही अपना धर्म कहा। जैसे पिता के वचनों का पालन करना एक
पुत्र का कर्म है, ये पुत्र धर्म कहलाता है। क्यों की इंसान अलग-अलग होते है, तो
उनका कर्म भी अलग-अलग होता है। जिसका मतलब है की धर्म भी अलग-अलग होता है। अर्थार्त
हर इंसान का कर्म या धर्म अलग-अलग होता है। इस प्रकार धर्म व्यक्तिगत विषय है। मूल
रूप से ये धर्म चार श्रेणियों में बांटा जाता है। आप ये भी कह सकते है की इंसान की
कर्म अनुसार चार श्रेणियां होती है। ज्ञान-विज्ञान के प्रचार-प्रसार का कर्म, समाज
की सुरक्षा का कर्म, समाज के लिए धन अर्जन का कर्म और विनिर्माण कर्म (विभिन्न
प्रकार के उत्पादो के निर्माण, उत्सर्जन और सेवा कर्म)। आधुनिक समय में इसे मनुफक्चारिंग
और सर्विस सेक्टर कहा जा सकता है। आप शायद इस बात को समझ नहीं पाए तो आसान शब्दों
में कहता हूँ। ब्राहमण, छत्रिय, वैश्य
और शुद्र। ज्यादातर पाठक इसे जाति कहते है। पर श्रेणि का अर्थ जाति किसी भी शब्दकोष में
नहीं है। वेदों में इसे वर्णाश्रम व्यवस्था कहा गया है। और ना सिर्फ भारत बल्कि
पुरे जम्बूद्वीप की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सैनिक और प्रशासनिक व्यवस्था यही
थी। एक ही व्यवस्था हर जगह लागू की गई थी। ताकि समाज में विघटन और विसंगतियां पैदा
ना हो। खैर ये अलग विषय है। मैं इसके विस्तार में नहीं जाऊंगा। तो कर्म ही धर्म
होता है। और ये अलग–अलग व्यक्तियों का अलग–अलग होता है। इन चार श्रेणियों के अलावा
व्यक्तिगत रूप से धर्म अलग-अलग होते है जैसे राजा का धर्म, प्रजा का धर्म, पिता का
धर्म, माता का धर्म, बेटे का धर्म, बेटी का धर्म, पति का धर्म, पत्नी का धर्म, भाई
का धर्म, मित्र का धर्म, शत्रु का धर्म आदि। गौर करने वाली बात ये है की माता,
माता ही होती है सगी माँ का धर्म और सौतेली माँ का धर्म अलग–अलग नहीं होता। इसी
प्रकार सगा पुत्र और सौतेला पुत्र का धर्म अलग–अलग नहीं होता। पर भाई का धर्म अलग
होता है जैसे बड़े भाई का धर्म, छोटे भाई का धर्म। इसी प्रकार बड़े भाई की पत्नी(बड़ी
भाभी) के साथ धर्म और छोटे भाई की पत्नी के साथ धर्म की भी अलग-अलग परिभाषा है। दरअसल
महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखी गई रामायण हो या गोस्वामी तुलसीदास द्वारा लिखित राम
चरित मानस हो, धर्म के विषय में विस्तार से बताया गया है। उदाहरण लेते है। माता का
धर्म एक ही होता है। इसलिए रामायण काल में तीनो माताओं के प्यार और स्नेह में कोई
फर्क नहीं था। बात जब राजतिलक की आई तो मंथरा के उकसावे में आकर कैकई अपने
धर्म(कर्म) के मार्ग से भटक गई। नतीजा अपने पति द्वारा पूर्व काल में दिए गए वचनों
का हवाला देकर उसने भरत के लिए राजा का पद और राम के लिए वनवास मांग लिया। भरत के
राज तिलक से राजा दशरथ को भले ही कोई आपति ना होती, पर राम के लिए वनवास के वचन से
उनकी सेहत ख़राब हो गई। उसके बाद वो कुछ कर ही नहीं पाए और मृत्यु को प्राप्त हुए। पिता
के वचन को पूरा करना पुत्र का धर्म होता है। माँ के आदेश का पालन करना भी पुत्र का
धर्म होता है। इसलिए श्रीराम ने कैकई से कोई सवाल जवाब नहीं किया। माँ की आज्ञा
मान कर वनगमन किया। आप देख सकते है की माँ(कैकई) अपने कर्म के मार्ग से भटक गई पर
पुत्र(राम) नहीं भटके। अपने पिता की मृत्यु के बाद उनके वचन निरर्थक हो गए थे। वो
वापस लौट सकते थे। परन्तु राम ने इन वचनों को अपने पिता की अंतिम इच्छा समझ कर
पूर्ण किया। इसी प्रकार माता सीता के निष्कासन के समय भी उन्होंने राजा के धर्म का
पालन किया। क्यों की राज का कोई निजी संबंध नहीं होता। राजा का धर्म प्रजा की ख़ुशी
होता है। दरअसल ये वो विषय है जिस कारण बहुत से लोग राम पर ऊँगली उठाते है। परन्तु
उनको मेरा यही सुझाव है की एक बार रामायण पढ़ ले। आप के सवालों के जवाब उसके अन्दर
ही है। एक उदहारण ये भी देना जरुरी है की राजा राम जब अपने महल में अपनी माँ के
साथ होते थे तो उनके चरणों में बैठते थे जबकि राजसभा में अपनी माँ से अधिक ऊचे आसन
पर बैठते थे। क्यों की उस सभा में वो राजा राम थे। कोशल्या सुमित्रा, कैकई उनकी
माँ नहीं उनकी प्रजा थी। जबकि महल में वो उनकी माँ। धर्मानुसार आचरण।
ऊपर मैंने लिखा है की बड़े भाई की पत्नी(बड़ी भाभी)
के साथ धर्म और छोटे भाई की पत्नी के साथ धर्म की भी अलग-अलग परिभाषा थी। इसका
वर्णन भी करना जरुरी है। बड़े भाई की पत्नी माँ समान होती है जबकि छोटे भाई की
पत्नी पुत्री समान। अब ये बात तो हर कोई जानता ही है की एक व्यक्ति जो व्यवहार
अपनी माँ के साथ करता है वो पुत्री के साथ नहीं करता। माँ के पैर छुए जाते है जबकि
पुत्री को आशीर्वाद दिया जाता है। यही कारण है की लक्षमण अपनी भाभी (सीता) के पैर
छुते थे। जबकि राम उर्मिला को आशीर्वाद देते थे। जबकि दोनों ही भाभी थी। यहाँ पर
ये बात सामने आती है की जिसे मैं धर्म या कर्म कह रहा हूँ वो तो आचरण है। अर्थार्त
इंसानी व्यवहार। या रिश्ते। इसका जवाब ये है की ये आचरण ही तो कर्म निर्धारित करता
है। ये आचरण एक व्यक्ति में उसकी नैतिकता से आता है। अब ये नैतिकता क्या चीज है?
नैतिकता भी इंसानियत या मानवता मानवीयता आदि जैसे
गुण है। जिन्हें विशेषण कहा जाता है। विशेषण आप सब ने पढ़े होंगे। जैसे- सुन्दर
भवन, इसमें असली तत्व क्या है? भवन। पर वो है कैसा? सुन्दर है। किसी भी संज्ञा या
सर्वनाम से पहले लग कर उसकी विशेषता बताने वाले शब्द को विशेषण कहते है। तो जब हम इंसान
की या मानव की प्रजाति की बात करते है तो नैतिकता और मानवता दो विशेषण होते है
मानव प्रजाति के। जो लोग मानवता या इंसानियत को सबसे बड़ा धर्म मानते है। वो दरअसल
अपने अज्ञान का ढोल पीटने का काम करते है। उदारहण देखे- कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के
साथ एकांत में है तो उनका व्यवहार कैसा होंगा। जाहिर सी बात है वो पति-पत्नी है,
अपना परिवार आगे बढ़ाना है तो अन्तरंग संबंध बनाएँगे और ये गलत भी नहीं है। अनैतिक
भी नहीं है और ये उनका कर्म या धर्म भी है। लेकिन वही व्यक्ति इसी तरह एकांत में
अपनी माँ के साथ है, अपनी भाभी के साथ, अपनी बेटी के साथ या बहन के साथ, प्रजा की
किसी अन्य औरत के साथ, वर्तमान समय की बात करे तो अपनी साली के साथ या अपनी पत्नी
की सहेली के साथ अथवा अपनी किसी पड़ोसन के साथ है तो क्या इस तरह के अन्तरंग संबंध
बनेंगे? बिल्कुल नहीं। अपनी पत्नी के अलावा अन्तरंग संबंध अन्य किसी भी औरत/पुरुष
के साथ बनाना अनैतिक है। इसे अधर्म कहते है। मेरे कहने का अर्थ ये है की मनुष्य का
आचरण उसके धर्म से निष्पादित होता है। अगर धर्म निकाल दिया जाए तो मनुष्य की
प्रजाति और अन्य पशु-पक्षियों की प्रजाति में कोई फर्क नहीं रहेगा। जैसे अन्य प्रजातियों
में होता है सिर्फ नर और मादा का संबंध। वैसा ही कुछ नर-मादा का संबंध इंसानों में
भी होंगा। आज कल ये चलन आम होता जा रहा है वर्तमान समय में इस तरह के अनैतिक संबंध
हजारो तरह की समस्याओं और अपराधों को जन्म दे रहे है। और इसका कारण है गलत आचरण।
हम रोज पढ़ते है सुनते है। और सोचते है की कौन है ये लोग जो इस तरह रिश्तो को
तार-तार करते है। दोष भगवान् को देते है या धर्म को देते है की क्यों बनाए ऐसे लोग।
भगवान् से तो सही बनाए थे। लोग खुद ही अधर्म के मार्ग पर चल पड़े तो इसमें भगवान्
या धर्म की क्या गलती। महाभारत के द्रोपदी चीर हरण के प्रसंग का हवाला देकर कहा
जाता है की इसने मर्दों को औरत का अपमान करना सिखाया। पर उस महाभारत में ये भी
बताया गया की एक औरत की बेईज्जती करने की सजा पुरे कुल के विनाश के रूप में मिली। इंसान
के शरीर में जो बुद्धि नामक अंग है ये उसका कार्य है की वो धर्मानुसार अपना कर्म
करे।
जैसा की ऊपर लिखा जा चुका है की धर्म किस प्रकार
अलग-अलग होते है। इसी आधार पर अन्य धर्म ग्रंधो में कहा गया है की भारत और पूरी
दुनिया बहुधार्मिक है। अलग-अलग प्रकार के धर्म है। आमतौर पर आजकल इसका अर्थ
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी आदि लगाया जाता है। ये भी
स्थूल बुद्धि की उपज है। पर क्या करे? ये सब बचपन से किताबी जानकारी का रट्टा लगवा-लगवा
कर परीक्षाएं पास करवाई जाने वाली शिक्षा का असर है की बच्चो की सूक्ष्म बुद्धि,
शिक्षा पूरी करने के बाद स्थूल बुद्धि बन जाती है। फिर उन्हें अलग-अलग चीजे भी एक
ही जैसी नजर आती है। पर शिक्षित होने में और ज्ञानी होने में बहुत बड़ा फर्क होता
है। ज्यादातर लोग तो इन दोनों के बीच का फर्क भी नहीं बता पाएंगे। खैर मैं अपनी बात पर आता हूँ। गीता में श्रीकृष्ण
ने भी कहा है की पूरी दुनियाँ में अलग-अलग धर्मो का पालन करने वालो में सब में मैं
ही हूँ। अर्थार्त सब में मेरा ही रूप है फिर चाहे वो एक रेंगने वाला सरीसर्प हो या
हाथी। आकाश में उड़ने वाला पक्षी हो या जल में रहने वाली मछली। उस वक़्त (महाभारत काल)
में कहा थे मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी आदि? दरअसल जिन्हें हम
धर्म समझ रहे है, वो संप्रदाय है। बहुधार्मिक का अर्थ वही है जो ऊपर लिखा है। हर
व्यक्ति का अलग-अलग धर्म। जैसे राजा का धर्म, प्रजा का धर्म, पिता का धर्म, माता
का धर्म, बेटे का धर्म, बेटी का धर्म, पति का धर्म, पत्नी का धर्म, भाई का धर्म,
मित्र का धर्म, शत्रु का धर्म आदि। तो सवाल ये है की ये सब संप्रदाय धर्म के नाम
से प्रसिद्ध कैसे हो गए? इसके कई कारण है। पर वो सब इस लेख का विषय नहीं है।
धर्म की उत्पप्ति और अंत की बात करते है। एक बात
बहुत अच्छी तरह से समझने वाली है की दुनिया में धर्म का अस्तित्व सबसे पहले तब आया
था, जब धरती पर सबसे पहले जीव को शरीर मिला था। सबसे पहला जीव। जरुरी नहीं की वो
इंसान ही हो। क्यों की इंसान की प्रजाति से भी ज्यादा पुराने जीव इस धरती पर है। और
धर्म का अंत तब होंगा, जब इस धरती का सबसे आखिरी जीव अपना शरीर त्याग देगा। आमतौर
पर हम यही मानते है की जीव मतलब जीवन, मतलब इंसान। इंसान है तो जीवन है। इंसान
ख़त्म तो जीवन ख़त्म। बाकि सारे पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, नभचर-जलचर, सरीसर्प, कीट-पतंगे
आदि तो इंसान को संतुष्ट करने के लिए है। हालाँकि वैज्ञानिक भी ये बात साबित कर
चुके है की पेड़-पौधे भी जीवित प्राणी होते है। पर स्थूल बुद्धि मानती ही नहीं। इंसान!
क्या नहीं कर सकता! इंसान चाहे तो बड़े-बड़े जंगलो में आग लगा, उन्हें नष्ट कर दे!
बड़े-बड़े महासागर सुखा दे! विशालकाय पहाड़ो को मिटटी में मिला दे! क्या नहीं कर सकता
इंसान! बस यही अहंकार इंसान को इस बात पर यकीन करने नहीं देता की उसकी प्रजाति भी
इस धरती की अन्य प्रजातियों की तरह सिर्फ एक प्रजाति है। एक मामूली प्रजाति। और
अन्य प्रजातियों की तरह उसे भी एक विशेष ताकत मिली हुई है, वो है बुद्धि। जिस पर
मनुष्य को घमंड है। लेकिन जब उसकी मौत आती है तो वो बुद्धि ही काम करना बंद कर देती है। जैसे
बिच्छु को बहुत घमंड है अपनी ताकत, अपने डंक पर, पर जब वो पानी में डूब कर मरता है
तो वो डंक किसी काम नहीं आता। भैसे को बहुत घमंड होता है अपनी ताकत, अपने सींगो पर।
इन सींगो से वो बड़े–बड़े जानवर को मार देता है, इंसानों को भी मार देता है, पर जब
शेर का भोजन बनता है तो वो सींग किसी काम नहीं आते। कहने का अर्थ ये है की इंसान
को इस बात का घमंड नहीं करना चाहिये की वो विशेष है। वो भी सिर्फ एक प्रजाति है। तो
ऊपर लिखी बात से ये बात स्पष्ट होती है की धर्म(कर्म) का संबंध शरीर से होता है।
शरीर पैदा हुआ तो धर्म शुरू हुआ (उस व्यक्ति का), शरीर ख़त्म हुआ तो धर्म खत्म हुआ।
तो धर्म ऐसी चीज नहीं है जिसे आप अपना सकते है या छोड़ सकते है। इसमें शामिल नहीं
हुआ जा सकता। इससे निकाला नहीं जा सकता ना ही निकल सकते है। तो जो लोग ये कहते है
की हमने हिन्दू धर्म छोड़ दिया है, इस्लाम में शामिल हो गए, ईसाई बन गए, बौद्ध बन
गए। वो गलत है। उन्होंने धर्म छोड़ा नहीं है, बल्कि एक खास संप्रदाय के नियमो का
पालन करना शुरू कर दिया है। यही कारण है की संप्रदाय में शामिल होने के या निकलने
के नियम या रीति-रिवाज बनाए गए है। जैसे खतना, बब्तिषता आदि। धर्म में इनकी जरुरत
ही नहीं पड़ती। कुछ लोग जनेऊ संस्कार को धर्म में शामिल होने की प्रक्रिया मानते है
जो गलत है। दरअसल ये संस्कार एक बच्चे को ब्रह्मचर्य जीवन और गुरुकुल जीवन में
प्रवेश के लिए होता है। जब बच्चा ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरुकुल में जाता है। उदाहारण
के तौर पर श्रीकृष्ण का जनेऊ संस्कार 14-15 साल की आयु में हुआ था। इससे पहले वो
कंस और उसके कई असुरो का वध कर चुके थे। अगर जनेऊ संस्कार धर्म में शामिल करने की
प्रक्रिया होती तो इस का अर्थ है की कृष्ण 15 वर्ष तक बिना धर्म के रहे। ज्ञात रहे
कृष्ण के बाल रूप की ही सबसे ज्यादा पूजा होती है धर्म में।
धर्म के विषय को आगे बढ़ाते है। धर्म की उत्त्पति
और अंत की जानकारी होने से एक बात साबित होती है की इसकी स्थापना नहीं की गई और ना
ही इसका कोई संस्थापक है. कुछ लोग आदि शंकराचार्य को धर्म का संस्थापक कहते है पर
इस तर्क में कोई दम नहीं है। क्यों की जो लोग धर्म विरोधी या नास्तिक है वो भी ये
बात बहुत अच्छी तरह से जानते है की अंतिम भगवान् श्री कृष्ण का जन्म आदि
शंकराचार्य के काल से बहुत पहले हो चुका था। श्रीकृष्ण अंतिम अवतार थे इसलिए वो
अपना सम्पूर्ण ज्ञान जिसमे सम्पूर्ण ब्रहमांड का ज्ञान निहित है वो अर्जुन के
माध्यम से श्रीमद्भागवत गीता के रूप में दे गए। जिसे बाद में लिपिबद्ध किया गया। अब
इससे पहले मैं धर्म (कर्म) के मार्ग पर चलने के बारे में बताऊ एक दुविधा यही दूर
कर देता हूँ। वो है नाम। धर्म का नाम।
पूरी दुनियाँ में धर्म एक ही है इसलिए इसका कोई
नाम नहीं है। ये आदि और अनंत है इसलिए इसे आदि धर्म या सनातन धर्म कहा जाता है।
वेदों की रचना के बाद इसे वैदिक धर्म कहा गया। उसके बाद श्रेष्ठ मनुष्यों को आर्य
पदनाम देने का चलन शुरू हुआ। बाद में ये पदनाम अयोग्य व्यक्तियों ने भी रखना शुरू
कर दिया परन्तु तब तक आर्य धर्म भी कहा जाने लगा। वर्तमान काल(यूरोपियन
उपनिवेशवादी और उसके बाद का काल) में इस
बात का फायदा उठाकर कुछ लोगो ने आर्य-अनार्य, आर्य-शुद्र आदि की काल्पनिक कहानियाँ
बना कर खुद के स्वार्थो की पूर्ति की। मैं इस विषय के विस्तार में नहीं जाऊँगा। अंत
में इस धर्म का वर्तमान में प्रसिद्ध हिन्दू धर्म नाम पड़ा। नाम की पहचान इसलिए भी
जरुरी हो गई थी क्यों की यूरोपियन उपनिवेशवादी और उसके बाद के कालखंड में अन्य
सम्प्रदायों को धर्म साबित करने का दुश्चक्र रचा गया। ये वो काल था जब दुनिया भर
के सभी संप्रदाय अस्तित्व में आ चुके थे, और उनके अस्तित्व को भी 500 साल से भी
ज्यादा समय हो गया था जैसे यहूदी, जैन, बौद्ध, ईसाई, इस्लाम और सिख। उसके बाद की
दुनिया जिसे हम आधुनिक दुनिया मानते है में जो संप्रदाय स्थापित हुए है उन्हें अभी
तक संप्रदाय, पंथ, संस्था, संगठन या मिशनरी आदि ने नाम से ही जाना जाता है जैसे साईं,
ब्रहम्कुमारिज, निरंकारी, धन-धन सतगुरु, सतलोक आदि। अभी हाल फिलहाल लिंगायत को
सरकारी आदेश के अनुसार अलग धर्म घोषित किया गया है। इसी प्रकार महर्षि वाल्मीकि के
नाम पर और जय भीम के नाम से भी एक आन्दोलन खड़ा हो चुका है संभवत दलित संप्रदाय भी
अस्तित्व में आ जाए। इन सब सम्प्रदायों में एक बात ये कॉमन है की ये लोग अभी से
अपने-अपने गुरुओ की फोटो, मूर्तियों आदि की पूजा करना शुरू कर चुके है। ब्रहम्कुमारिज
वाले एक अलग ही ब्रह्मा की फोटो दिखाते है। साईं की फोटो और मुर्तिया भी हर पूजा
घर में मिल जाएंगी। दरअसल हर संप्रदाय को अपने प्रारंभिक श्रद्धालु धर्म से ही
मिलते है। इस विषय को मैं इस वाक्य के साथ ख़त्म करता हूँ की संभवत 300-400 साल बाद
कोई अन्य धर्म भी अस्तित्व में आ जाए।
धर्म का जो सबसे आधुनिक नाम है हिन्दू धर्म। ये
मूल रूप से कोई अरबी-फारसी शब्द या उन लोगो के उच्चारण की गलती से निर्मित नहीं है।
कुछ लोग हिन्दुस्तान को भी अरबी-फारसी मूल का मानते है वो भी गलत है। संक्षेप में
इतना ही बताऊंगा की ऋग्वेद के बृहस्पति आगम में हिन्दुस्थान का
स्पष्ट उल्लेख है।
हर व्यक्ति का धर्म या कर्म अलग-अलग
होता है। क्या सही है क्या गलत इसका फैसला कैसे हो? इंसान को कैसे पता चले की उसका
सही कर्म(धर्म) क्या है? लेख के शुरुआत में मैंने एक उदाहरण दिया था माँ-बाप का अपने
बच्चो के लिए किया गया कर्म। पर वो सही कर्म नहीं था। तो सही कर्म क्या है? इस का
निर्धारण कैसे हो? कौन करेंगा? कौन बताएगा सही कर्म? किसी गुरु के पास जाए जो सही
मार्ग दिखाए!!! रुक जाओ। इस से पहले की आप किसी गुरु की खोज शुरू कर दो श्रीकृष्ण
को ही अपना गुरु मान लो। श्रीमद्भागवत गीता पढ़ो आप को कोई इंसानी गुरु की जरुरत
नहीं रहेंगी। लोगो की पूरी जिन्दगी निकल जाती है। पर उन्हें कर्म का पता ही नहीं
चलता एक दिन में 20 घंटे काम करने वाला आदमी। जानता ही नहीं की क्या कर्म है। पूरी
जिन्दगी अपने बच्चो के भविष्य को सवारने में लगा देने के बाद अंतिम समय में अहसास
होता है की अरे पूरी जिन्दगी किस चीज में खपा दी। क्या निजी कंपनी में नौकरी करना
है कर्म? या सरकारी नौकरी मिलना है कर्म? कर्म करना जितना आसान है उससे भी कही
अधिक मुश्किल है अपने कर्म की खोज करना। आप हम सब तो बहुत मामूली लोग है बड़े-बड़े
ज्ञानी, महा ज्ञानी, तेजस्वी, पराक्रमी लोग भी नहीं समझ पाए की उनका कर्म क्या है।
उदारहण स्वरूप रावण जैसा महाज्ञानी नहीं समझ पाया की उसका कर्म क्या है? नतीजा
अपनी ही बहन के राज्य पर ना सिर्फ हमला कर दिया बल्कि अपने बहनोई (सूर्पनखा का
पति)का वध भी कर दिया। खुद के अनुसार रावण सही था उसने शत्रु धर्म का पालन किया
परन्तु धर्मानुसार गलत किया। ये युद्ध अकारण था। बाद में माता सीता का हरण किया। और
अपने साथ अपने पुरे वंश का नाश करवा लिया। क्यों नहीं समझ सका वो अपने कर्म का
मार्ग। जबकि वो महान बुद्धिमान और ज्ञानी था। कैकई का उदाहरण मैं पहले ही दे चुका
हूँ। महाभारत काल पर आते है। भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य आदि जैसे महान
बुद्धिजीवी भी अपने कर्म का ज्ञान नहीं कर पाए। सिर्फ एक व्यक्ति था जिसे अपना
मार्ग पता था। विदुर। नतीजा उसने धर्म का साथ नहीं दिया तो अधर्म के साथ भी खड़ा
नहीं हुआ। द्रोणाचार्य, कृपाचार्य को भी पता था
की हम अधर्म के साथ खड़े है परन्तु। राजा की नौकरी, उससे प्राप्त धन और राजा के नमक
का फर्ज के नाम पर अपने कर्म के मार्ग से भटक गए। वहीँ भीष्म पितामह तो क्षणिक
आवेश में लिए गए वचन के कारण अपने कर्म से भटक गए। हस्तिनापुर की रक्षा करने का
वचन, आजीवन ब्रह्मचारी रहने के वचन के साथ आजीवन राजा के पक्ष में रहने का वचन
लेकर कर्म से दूर हो गए। उन्होंने अपने कर्म के ऊपर अपने वचन को रखा। उन्होंने ये
नहीं सोचा की भविष्य में यदि राजा अयोग्य निकला तो मैं क्या करूँगा? राजा का
निर्णय हस्तिनापुर के खिलाफ गया तो मैं क्या करूँगा? उन्होंने राजा और हस्तिनापुर
दोनों की रक्षा का वचन लिया था। पर हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र ने पुत्र मोह में गलत निर्णय लिया ये भी बात वो
जानते थे। फिर भी उन्होंने राजा के साथ देने के वचन का पालन किया और हस्तिनापुर के
विनाश का मार्ग प्रशस्त किया। अगर हस्तिनापुर की रक्षा के वचन का पालन करते तो वो
पांडवो के साथ होते और राजा के निर्णय का समर्थन वाला वचन भंग होता। कुल मिला कर
उनका एक वचन तो भंग होना ही था। वचन का पालन करना श्रेष्ठ है परन्तु वचन और कर्म
में से किसी एक का चुनाव करना हो तो कर्म का चुनाव करना श्रेष्ठतम होता है। महाभारत
के युद्ध में श्रीकृष्ण ने ये बात खुद करके दिखाई भी थी। आप लोगो को ज्ञात ही
होंगा की श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध में अस्त्र-शस्त्र
धारण नहीं करने का वचन लिया था। फिर भी जब अर्जुन भीष्म पितामह से युद्ध करने के
लिए तैयार नहीं हुआ तो वो खुद सुदर्शन चक्र लेकर भीष्म पितामह को मारने के लिए
दौड़े। कुछ दिन पहले लिए गए अपने ही वचन को खुद ही तोड़ दिया श्रीकृष्ण ने। सिर्फ ये
साबित करने के लिए की वचन और कर्म के चुनाव में कर्म का ही चुनाव करना चाहिए। भीष्म
पितामह उस वचन पर अडिग रहे जो उन्होंने अपनी किशोर अवस्था में क्षणिक आवेश में आ
कर लिया था जबकि युद्ध उस समय हुआ जब पितामह के पडपोते अभिमन्यु के भी पुत्र होने
वाला था। ऐसे वचनों का कोई मोल नहीं होता। एक सवाल सब के मन में आ सकता है की श्रीराम
ने वचन का पालन किया तो वो धर्म, और भीष्म पितामह ने वचन का पालन किया तो अधर्म
कैसे? इस का जवाब आसान सा है। श्रीराम के समय कर्म और वचन में से किसी एक का चुनाव
करने वाली परिस्थिति कभी बनी नहीं था। इसलिए वो आराम से वचन का पालन कर पाए जबकि
यहाँ ऐसा नहीं था। तो क्या कर्म परिस्थितियों के अनुसार बदलता है? बिल्कुल बदलता
है। कर्म का निर्धारण परिस्थिति पर निर्भर करता है। एक ही कर्म एक परिस्थिति में
सही तो दूसरी परिस्थिति में गलत हो सकता है। समय, काल, व्यक्ति आदि हर चीज कर्म पर
प्रभाव डालती है। इसलिए तो जैसे मैंने पहले लिखा था की कोई अन्य व्यक्ति किसी को
उसका कर्म नहीं बता सकता। कर्म के मार्ग का चुनाव खुद ही करना पड़ता है। वैसे तो हर
आदमी अपने कर्म का निर्धारण खुद करता है। पर सही कर्म का चुनाव किया गया है ये कौन
बताएगा? कर्म सही है या नहीं ये निर्णय लेने के लिए व्यक्ति को अपनी आत्मा से बात
करनी होंगी। जी हाँ। हर जीव के अन्दर भगवन का अंश होता है जिसे आत्मा कहते है। उसके
साथ बात करके ही इंसान अपने कर्म को निर्धारित कर सकता है। क्या आत्मा बोलती है?
जी हाँ। बुरे इंसान के अन्दर भी बोलती है। उदाहरण के तौर पर कोई व्यक्ति पहली बात
कोई गलत काम करने जा रहा हो। चोरी करने, बैंक लुटने, किसी की हत्या करने या किसी
महिला का शील भंग करने। तो क्या होता है। बैचनी, डर, घबराहट, शरीर फूल जाता है,
हाथ पैर कांपने लगते है। बार–बार एक भावना सी आती है की ये गलत है। नहीं करना
चाहिए। करू या ना करू। ये ही उस आत्मा की आवाज है जो अलग-अलग तरीको से हमें उस गलत
काम को करने से रोकती है। ये काम करूँगा तो वो हो जाएगा। अगर ऐसा हो गया तो? अगर
वैसा हो गया तो? ये जितने भी नकारात्मक अगर-मगर दिमाग में आते है ये सब गलत कर्म
से व्यक्ति को रोकने के लिए ही आते है ये ही आत्मा की आवाज होती है। दरअसल ये सब
जीवात्मा द्वारा दी जाने वाली प्रतिक्रियाएं है। इस विषय में आगे जाने से पहले
अपने शरीर के बारे में जाने। श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार आत्मा जो परमेश्वर का ही
अंश है वो एक जीवन काल में कई शरीर धारण करती है। जैसे शिशु का शरीर, बालक का
शरीर, किशोर का शरीर, नवयुवक का शरीर आदि। शरीर बढ़ता (बदलता) रहता है आत्मा वही
रहती है। शरीर ख़त्म होने के बाद(मृत्यु) के बाद या तो आत्मा नया शरीर धारण कर लेती
है या परमेश्वर में सम्माहित हो जाती है। आत्मा अजर, अमर होती है, वायु सुखा नहीं
सकती, आग जला नहीं सकती, पानी भिगो नहीं सकता, कोई भी अस्त्र-शस्त्र उसे मार नहीं
सकता, चोट नहीं पहुँचा सकता। अंतिम वाक्य में जो बाते बताई है वो आप जानते भी होंगे। तो शरीर भी पांच प्रकार
के होते है। हर शरीर एक खास तत्व की प्रधानता लिए होता है। जो हमारा बाहरी शरीर है
इसे स्थूल शरीर भी कहते है। इसमें पृथ्वी तत्व की प्रधानता होती है इसलिए ये सब को
नजर आता है। इसका विकास होता है और नष्ट भी होता है। एक आम कहावत है की मिट्टी का
शरीर है मिट्टी में मिल जाएगा। बाकि अन्य चार शरीर सूक्ष्म शरीर होते है। शबसे
अंतिम अर्थार्त पांचवा शरीर जीवात्मा कहलाता है। जिसके अन्दर आत्मा का निवास होता
है। जीवात्मा ही कर्म का निर्धारण कर सकती है अगर मन उससे पूछता है तो? क्यों की
मरने के बाद इंसान के पाप और पुण्य कर्मो के अनुसार स्वर्ग और नरक के सुख-दुःख
जीवात्मा को ही भोगने पड़ते है। आमतौर पर हम यही मानते है की आत्मा को फल भोगने
पड़ते है। अच्छे कर्म करो तो आत्मा स्वर्ग जा कर सुख प्राप्त करती है बुरे कर्म
करने पर आत्मा को नर्क में यातनाएं मिलती है। कुछ लोगो का सवाल ही यही होता है की
आत्मा को तो कुछ भी महसूस नहीं होता तो क्या फर्क पड़ता है वो स्वर्ग जाए या नर्क। पर
वो आत्मा नहीं जीवात्मा होती है। जो स्वर्ग या नर्क में जाती है। आत्मा कहा जाती
है वो बता चुका हूँ। तो जो हम अंतरात्मा, मन का ख्याल, दिल की बात, दिमाग कह रहा
है, जैसी बाते करते है वो जीवात्मा की आवाज होती है जो गलत कर्म करने से रोकती है।
जैसे-जैसे इंसान बुरे कर्म करता जाता है वैसे-वैसे ये आवाज बंद होती जाती है। उदाहरण
स्वरूप अपनी जिन्दगी का पहला क़त्ल करने वाले आदमी की स्थिति और 10-15 क़त्ल करने
वाले आदमी की स्थिति अलग-अलग होती है। पहली बैंक डैकती करने में जितना डर लगता है।
उतना डर 20वी बैंक डैकती में नहीं लगता। पहला झूठ बोलना बड़ा मुश्किल होता है, लेकिन
बाद में तो झूठ के अलावा मुहँ से कुछ निकलता ही नहीं। यही आज के मनुष्य की सच्चाई
है। तो एक जीव अपनी जीवात्मा की बात सुन कर अपने सही कर्म का निर्धारण कर सकता है।
जैसे-जैसे हम अच्छे कर्म करते जाते है वैसे-वैसे जीवात्मा की आवाज अधिक स्पष्ट
होती जाएगी। और जैसे–जैसे हम बुरे कर्म करते जाएँगे वैसे-वैसे ये आवाज बंद हो
जाएगी। पर बिल्कुल शुरुआत कैसे करे। इसका जरिया है योग, अध्यातम, प्राणायाम,
आस्था, भगवान् में विश्वास। गीता में इसे भक्ति योग कहा गया है। भक्तियोग कर्म योग
से बड़ा नहीं है, ना ही छोटा है। भक्ति योग कर्म योग को प्राप्त करने का साधन है। भक्तियोग
वो अवस्था है जब मनुष्य योग, अध्यातम,
प्राणायाम, आस्था, भगवान् में विश्वास जैसे उपायों का प्रयोग करने अपने मन को
स्थिर कर लेता है। समबुद्धि। ना सुख की चाहत ना दुःख की चिंता। ना जीत की ख़ुशी ना
ही हार का दुःख। स्थिरबुद्धि जीव ही कर्मयोग को प्राप्त कर सकता है। भक्ति योग के
जरिए जीव अपने मन को नियंत्रित करता है। शरीर एक रथ के समान है। आत्मा इस रथ की एक
सवारी, मन इस रथ का सारथि और हमारी इन्द्रियां है इस रथ के घोड़े। जीवात्मा मन को
निर्देश दे देती है की कहाँ जाना है परन्तु मन तो चंचल है। इसे सांसारिक (भौतिक
दुनियाँ) में जितना लीन करते है उतना ही हमारा नियंत्रण मन पर से कमजोर होता जाता
है। और इस मन को कमजोर करने का श्रेय रिश्तों को जाता है। कल्पना करे एक शिशु जब
वो पैदा हुआ, तो क्या उसे भोजन का स्वाद पता होता है? क्या वो फास्टफूड, पैकिटबंद
फ़ूड आदि खाने की जिद्द करता है। नहीं। उसे तो पता भी नहीं इन सब के बारे में। पर
एक 10 साल का बच्चा। वो रोज इस खाने की जिद्द करता है। ना देने पर लड़ता है
चीखता-चिल्लाता है। काम नहीं करता, बात नहीं सुनता। हालात इतने बुरे भी हो जाते है
की जब तक ये चीजे उसे लाकर ना दो या खुद जा कर खाने के पैसे ना दो तो वो भोजन भी
छोड़ देता है। अंत में आप लोग ममता वश उसे ये चीजें खाने देते हो। आप को पता है ये
गलत है। उसके स्वास्थ के लिए नुकसानदायक है। पर बच्चा है जिद कर रहा है आदि बहाने।
सवाल ये है की उसे ये सब खाने की आदत कैसे पड़ी? किसी को अच्छा लगे या बुरा पर ऐसे
बच्चो को इस तरह की आदते उसके परिजनों ने ही लगाई है। नतीजा ये होता है की उसका मन
भोजन की जगह फास्टफूड की ही मांग करता है। भविष्य में क्या हम ये उम्मीद कर सकते
है की इस तरह के बच्चे अपने मन पर नियंत्रण रख पाएँगे। नहीं, बिल्कुल भी नहीं। दुनियाँ
में दो ही तरह के जीव होते है। पहले वाले वो जो
अपने मन पर नियंत्रण रखते है। दुसरे वो जो अपने मन के नियंत्रण में होते है।
पहले प्रकार के लोग आज के समय में बहुत ही कम मिलते है। शायद ना के बराबर। और
दुसरे प्रकार के लोगो को ढूंढने की क्या जरुरत वो तो हर जगह है। मन पर नियंत्रण
रखने के लिए ही योग, अध्यातम, भक्ति, आस्था जैसे साधन बनाए गए है। दरअसल आप खुले
मैदान में मुर्गियों को पकड़ सकते हो। तराजू में मेंडको को भी तोल सकते हो परन्तु
मन पर नियंत्रण नामुमकिन है। जब नामुमकिन है तो फिर करे ही क्यों? ये सवाल मन में
आ सकता है। तो इसका जवाब ये है की फिर दुनियाँ में जो हो रहा है वो होने दो। जो भी
अच्छा या बुरा या बत्तर हो रहा है। उसके जिम्मेदार आप भी हो, ये सोचो। धर्म को या
भगवान् को दोष मत दो। उदाहरण के तौर पर अगर किसी महिला का रेप होता है, या कोई
अन्य जघन्य कांड होता है या आपका खुद का
व्यक्तिगत रूप से नुक्सान होता है तो चुप रहो, भगवान् ये क्या हो रहा है, भगवान ये
कैसी दुनियाँ बनाई है, मेरे साथ ये क्यों किया, भगवान् उस दोषी को नर्क में डाल दे,
हाय भगवान, हे भगवान आदि जैसी बाते बनाना बंद कर दे। क्युकी भगवान् कर्म करने नहीं
आएँगे। कर्म करने के लिए जीव है। पर आपने तो नामुमकिन कह कर अपना पिंड छुड़ा लिया। वैसे
भी भगवान् को इन सब बातो से कोई फर्क नहीं पड़ता। क्यों? क्यों की ये सब सांसारिक
चीजे है। शरीर के साथ घटित होने वाली। एक इंसान के जीवन में सबसे बड़ा हादसा क्या
है? किसी की मृत्यु। पर भगवान् के लिए तो मृत्यु जैसी कोई चीज है ही नहीं। सिर्फ
शरीर मरता है जीवात्मा उस शरीर द्वारा किए हुए कर्मो का फल भोगती है और आत्मा नया
शरीर धारण कर लेती है। हत्या, बलात्कार, अंग भंग होना, आर्थिक नुक्सान, जन्म,
विवाह आदि जैसी समस्या तो इंसान रूपी जीव के शरीर को प्रभावित करती है। मन को प्रभावित
करती है। आत्मा को नहीं। और अगर कोई इन सब के प्रभाव से मुक्त होना चाहता है तो
उसके लिए भक्तियोग है। जिसकी साधना से आप कर्मयोगी बन सकते है। भक्तियोग का अंतिम
निषकर्ष ये है की आप सभी भावो से मुक्त हो जाते है। आप का मन आसक्ति रहित हो जाता
है। रिश्ते-नाते, परिवार, आदि जैसी मानवीय भाव से मुक्त होना ही भक्तियोग है। अब
बात ये निकलती है की भावहीन मनुष्य। अगर इंसान भावहीन हो जाएगा तो उसमे और मशीन
में क्या फर्क रह जाएगा? फर्क ये है की एक मशीन हर काम नहीं कर सकती जबकि इंसान कर
सकता है। मशीन के काम का निर्धारण मनुष्य करता है जबकि मनुष्य के कर्म का निर्धारण
स्वयं मनुष्य को ही करना है। तीसरा सबसे बड़ा अंतर ये है की भावहीन होने का अर्थ
सभी रिश्ते खत्म कर लेना नहीं है। हिमालय जाकर तपस्या करना नहीं है। सभी रिश्तो का
पालन करते हुए भावहीन अवस्था का पालन करना है। साधारण शब्दों में कहे तो उपभोग
नहीं उपयोग। पर उपयोग निजी स्वार्थ के लिए नहीं। एक कर्म का उदाहरण लेते है। यहाँ
पर एक बात याद रखे की जहाँ पर मैं सही है, या पुण्य है, शब्द का प्रयोग करूँगा वो काम
करना चाहिए। और जहा पर गलत है, या पाप है, शब्द आए वो कर्म नहीं करना चाहिए।
हत्या पाप है। जीव अनुसार ये पुण्य भी
है। शेर किसी हिरण की हत्या करता है तो पाप नहीं है, क्यों की शेर का भोजन है हिरण।
मनुष्य हिरण का शिकार करता है। हत्या करता है, तो पाप है। हिरण इंसान का भोजन नहीं
है। भोजन के विकल्प के रूप में इंसान के पास अन्य चीजे है। ज्यादातर वो प्रक्रति
की सहायता से खुद उत्प्पन करता है। शेर ने पेट भरने के लिए हिरण को मारा, इंसान ने
अपने मनोरंजन के लिए, खाल के लिए, सींग के लिए या हड्डियों के लिए, निजी स्वार्थ है। पाप है। शेर
आराम से सो रहा है, इंसान ने उसकी हत्या कर दी, पाप है। निजी स्वार्थ के अलावा और
क्या आवस्यकता थी? कुछ नहीं। शेर एक जंगली जानवर का शिकार कर रहा है, आप ने उसकी
हत्या कर दी। क्यों? इंसानियत दिखाने के लिए? उस जंगली जानवर को बचाने के लिए? ये जानवर
उसका भोजन है। और जो आपने किया वो गलत है। यहाँ पर कुछ पाठको के अन्दर की इंसानियत
कुछ ज्यादा ही बढ़ सकती है। और उनके सवाल हो सकते है की वो जानवर भी तो भोजन की
तलाश में आया होंगा? वो जानवर अपने बच्चो के लिए भोजन लेने आया होगा? पर ये भी तो
संभव है की इस जानवर को बचाने के लिए जिस शेर को आपने मारा, वो भी गर्भवती मादा हो!
शेर ने भी अपने बच्चो के लिए शिकार किया हो! बहुत कुछ हो सकता है। यहाँ पर सही
कर्म यही है की मनुष्य प्रक्रति के मामले में दखल ना दे। बिना वजह की भावुकता या
अत्याधिक मानवता खुद को कर्म के मार्ग से भटकाती है। आजकल एक और चीज भी देखने को
मिलती है की टीवी पर जब कोई वन्यजीवों का कार्यक्रम आता है जिसमे एक शेर किसी
जानवर का शिकार करता है तो भी लोगो की भावना उस जानवर के प्रति होती है। वो जानवर
बच जाता है तो खुश होते है। शेर शिकार कर लेता है तो दुखी होते है और फिर बड़े आराम
से मांसाहारी भोजन का स्वाद लेते है। इंसान खुद मुर्गी, बकरी मछली आदि मांसाहारी
भोजन खाता है ये पाप है। क्यों की ये जीव इंसान के प्राक्रतिक भोजन नहीं है। आगे
बढ़ते है। जैसा की मैंने लिखा की हत्या पाप है। एक इन्सान किसी दुसरे इंसान की
हत्या करे तो पाप है। पर हत्या किस मकसद से की गई है। किस परिस्थिति में की गई है
उस हिसाब से पुण्य भी मिल सकता है। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति ने किसी अन्य अमीर
व्यक्ति का धन लूटने के लिए उसकी हत्या की तो पाप लगेगा। लेकिन किस व्यक्ति की जान
बचने के लिए, किसी महिला की रक्षा करने के लिए या अपने ही प्राणों की रक्षा करने
की लिए किसी की हत्या की तो पाप नहीं लगेगा। एक बुरा इंसान है, अधर्म के मार्ग पर
है। उसकी हत्या का पाप नहीं लगेगा। परन्तु हत्या करने वाला भी सुयोग्य व्यक्ति
होना चाहिए उस अधर्मी की हत्या करने के लिए। जैसे की उसे ये अधिकार प्राप्त हो की
अधर्मी का वध करना है। एक अधर्मी व्यक्ति की हत्या तभी सही मानी जाएगी जब वो पाप
कर्म कर रहा हो। एक उदाहरण और देंखे। एक बुरा व्यक्ति, बुरे कर्मो से उसने दौलत
प्राप्त की, दूसरी तरफ एक अच्छा व्यक्ति वो दो वक़्त की रोटी का भी मोहताज है। अब
वो गरीब व्यक्ति उस बुरे और अमीर व्यक्ति की हत्या करके उसका धन चुरा लेता है,
अपने भोजन के लिए। तो क्या ये पुण्य है? जी नहीं ये पाप है। पाठक बोल सकते है की वो अमीर व्यक्ति तो बुरा था।
उसने पाप मार्ग से धन कमाया था। उसकी हत्या करना सही है परन्तु गरीब व्यक्ति ने
उसकी हत्या धर्म की रक्षा के लिए नहीं अपने निजी स्वार्थ के लिए की है इसलिए पाप
है। निजी स्वार्थ नहीं होना चाहिए। एक और उदाहरण जो वर्तमान समय के अनुरूप है। एक
गरीब पति-पत्नी, और एक अमीर बुरा आदमी। गरीब आदमी अपनी पत्नी को उस अमीर आदमी के
पास भेजता है। वो पत्नी उस आदमी को अपने शरीर से रिझाने का काम करती है। वो आदमी
तो बुरा है। उतेजित हो गया। महिला का शील भंग करने को तैयार है और तभी उस महिला का
पति आ जाता है। वो उस अमीर आदमी की हत्या कर देता है। क्या है ये? ये पाप है। क्यों?
क्यों की यहाँ एक महिला को बचाया नहीं जा रहा था बल्कि सब कुछ एक योजनाबद्ध अपराध
था। इसलिए ये पाप है। निजी स्वार्थ नहीं होना चाहिए। कुछ आज के समय के उदाहरण
देखते है। ये उदाहरण रोजमर्रा के जीवन के है और लगभग सभी की जीवन में कभी ना कभी
घटित हुआ होंगा। आप सड़क पर जा रहे हो और आप को पांच, दस, पचास या सौ रुपए सड़क पर
पड़े मिल गए। तो आप क्या करते हो? पहला कर्म उन रुपए को अपनी जेब में डाल कर चलते
बनते हो! क्या ये सही कर्म है? दूसरा कर्म आप उन रुपए के असली मालिक को खोज कर
रुपए उसे देते हो! इस की तस्वीरे, विडियो आदि बनवाकर अपनी दयालुता और महानता का
प्रचार-प्रसार करते हो! क्या ये सही कर्म है? तीसरा कर्म आप असली मालिक को खोज कर
उसे रुपए दे देते हो! बिना किसी शोर शराबे के, बिना एहसान जताए! क्या ये सही कर्म
है? तीसरा कर्म ही सही है, पुण्य है, पहला कर्म अधर्म है, दूसरा कर्म धर्म के नाम
पर किया गया अधर्म है। इसी प्रकार कर्म सत, रज और तम प्रधान बनते है। ये लिखने की आवशयकता
नहीं की इन कर्मो में सात्विक कर्म, राजसिक कर्म और तामसिक कर्म कौन सा है।
वर्तमान समय में सरकारे ही राजा का पर्याय बन गई है। ऐसा ही एक सरकारी नियम है
ट्रफिक नियम। दो पहिया वाहन चलाते वक़्त हैलमेट लगाना, चार पहिया वाहन चलाते वक़्त
सीट बैल्ट लगाना, वाहन चलाते वक़्त फोन पर बात ना करना, वाहन के जरुरी कागजात
बनवाना आदि। पर कितने लोग इनका पालन करते है। जब ट्रफिक पुलिसकर्मी रोकता है तो
कितने लोग आराम से अपना वाहन रोक कर जरुरी कार्यवाही पूरी करवाते है और कितने लोग
अपना वाहन भगा के निकाल ले जाते है? कितने लोग अपने वाहन की दिशा मोड़ लेते है?
कितने लोग शोर्टकट लेकर बचने का प्रयास करते है? कितने लोग पकडे जाने पर अपने
चाचा, मामा, भाई, ताऊ, बाप पुलिस में है या विधायक है की धोंस ज़माने की कोशिश करते
है? कितने लोग होंगे जो पूरी ईमानदारी से पुलिस के पास खुद जा कर बोलते है की
मैंने नियम तोड़ा है, मेरा चालान कर दो? कोई करता है ऐसा? चालान से बचने के लिए
300-400 रुपए की रिश्वत खुद देते है पुलिसकर्मी को। क्यों? खुद तो अपना कर्म किया
नहीं और अब पुलिसकर्मी को भी अपने कर्म के मार्ग से भटकाने का प्रयास किया जा रहा
है। आप कह सकते है की पुलिसवाले बेईमान होते है, रिश्वत लेते है। तो आप सारे नियम
पूरे करो तो कैसे कटेगा चालान? अगर कोई नियम तोड़ा भी है जैसे हैलमेट नहीं लगाया तो
खुद अपनी मर्जी से अपना चालान कटवाओ। मत दो रिश्वत। पर उस वक़्त तो आप को अपने पैसे
बचाने होते है। मतलब पहली गलती से बचने के लिए दूसरी गलती। मेरे इस उदाहरण को गलत
साबित करने के लिए पाठको के पास बहुत सारे अगर-मगर, किन्तु-परन्तु होंगे। जैसे
सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार। सड़क बनाने में भ्रष्टाचार, पुल बनाने में भ्रष्टाचार,
वी. आई.पी. लोगो को छोड़ देना, पुलिस का भ्रष्टाचार, नौकरशाही का भ्रष्टाचार,
राजनीति का भ्रष्टाचार आदि। पर इन सब का अर्थ ये तो नहीं है की आप भी उस मार्ग पर
चल पड़ो। ये तो वही बात है की अगर कोई गड्डे में गिरने जा रहा है तो हम भी उसके साथ
गिरेंगे। वो अधर्म के मार्ग पर है तो हम भी धर्म का मार्ग छोड़ देंगे। वैसे एक बात
यहाँ साफ़ करना जरुरी है की ये पुलिस वाले, सरकारी अधिकारी और कर्मचारी, नेता आदि
जिन्हें हम भ्रष्टाचार का पर्यायवाची मान चुके है, ये लोग किसी दूसरी दुनियाँ से
नहीं आए। मंगल या शुक्र ग्रह से धरती पर नहीं टपके। वो भी हमारे समाज से ही निकले
है। हमारे इसी समाज का हिस्सा है वो लोग यही पैदा हुए, पढे-लिखे, नौकरी लगे। काम
के बदले धन लेने के संस्कार उनके परिजनों की देन है। आज आप को एक पुलिसवाला रिश्वत
लेता हुआ बहुत बुरा लगता है, परन्तु भविष्य में जब आप खुद पुलिसवाले बन जाओगे तो
क्या रिश्वत नहीं लोंगे? उस वक़्त आप रिश्वत लेने के कर्म को सही साबित करने के लिए
कोई ना कोई बहाना बना ही लोगे। ये अटल सत्य है। इस बात को इस उदाहरण से स्पष्ट
करता हूँ की मान लो आप कही जा रहे हो और सड़क पर एक पुरुष किसी महिला को पीट रहा हो
तो आप के मन में क्या विचार आएगा? पुरुष गलत है, महिला पीड़ित है। अगर एक महिला
पुरुष को पीट रही हो तो क्या विचार आएगा? पुरुष ने ही कुछ किया होंगा, बेचारी
महिला मजबूर हो गई होंगी। संभव है की भीड़ में से कुछ लोग उस पुरुष को मारने-पीटने
भी लग जाए, आप भी भीड़ का फायदा उठा कर उस पुरुष पर अपना हाथ साफ़ कर लोंगे। क्या उस
पुरुष को अपनी बात कहने का अवसर मिलेगा? क्या वहाँ पर कोई भी(आप भी) उस पुरुष का
पक्ष जानने का प्रयास करोंगे? बिल्कुल नहीं। दोनों घटनाओं में आपने पुरुष की ही
गलती निकाल दी। जबकि आप पूरी बात जानते ही नहीं। अब उस पुरुष की जगह आप हो तो? आप
जरुर चाहोंगे की आप की बात सुनी जाए, अपना पक्ष रखने का मौका आप को मिले। भीड़ को
आपको पीटने का कोई अधिकार नहीं है। यही है हमारी मानसिकता। जो सुविधा हम अपने लिए
चाहते है वो सुविधा कभी भी दूसरों को भी
मिलते हुए नहीं देख सकते। ऐसी मानसिकता के साथ कर्म के मार्ग पर नहीं चला
जा सकता। अपने प्रियजनों, परिजनो के साथ-साथ
अगर अनजान लोगों के प्रति भी आपके मन में अत्याधिक भावुकता, मानवता,
दयालुता आदि जैसे भाव है तो भी आप कर्म के मार्ग से भटक सकते है। आप कहेंगे की
दया, ममता, मानवता आदि तो अच्छे गुण है। ये तो परमेश्वर का मार्ग प्रशस्त करते है।
ये गुण गलत कैसे हो सकते है? पर इन अच्छे भावो की अधिकता भी नुकसानदायक होती है। किसी
गरीब या वृद्ध को भूख या गारीबी की अवस्था में देख कर मन द्रविड़ हो जाता है। हम
उसकी मदद करने का प्रयास करते है। पर ये जानना जरुरी है की क्या वो व्यक्ति सच में
उस दया का पात्र है। दारुण अवस्था में रहने वाला हर व्यक्ति दया का पात्र नहीं
होता। वो वृद्ध व्यक्ति जो दारुण अवस्था में जीवन जी रहा है। वो कभी तो जवान होंगा।
उसके पास भी अवसर होंगे। उसने धन भी कमाया होंगा। तो आज वो इस अवस्था में क्यों है?
हो सकता है की उसने अपना सारा धन शराब, जुआ और व्यभिचार में गवां दिया हो? ये भी
संभव है की उसने अपनी सारी धन दौलत ऐसे लोगो को दे दी हो जो उसे धोखा देकर भाग गए
हो? ये भी संभव है की उसने अपना पूरा जीवन अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए
खर्च कर दिया हो, और अब उसके बच्चो ने इस व्यक्ति को घर से निकाल दिया हो? पाप
कर्म करके भी धन कमाया हो सकता है, जो पाप मार्ग से ही खत्म हो गया हो? अपने पुरे
जीवन काल में इस व्यक्ति के पास हजारो अवसर आए होंगे(हर व्यक्ति के जीवन में आते
है) खुद को सम्भालने के पर इसने उनकी परवाह नहीं की। जिस वजह से आज वो ये दुःख भोग
रहा है? तो क्या ये व्यक्ति दया का पात्र है। बिल्कुल नहीं है। इस बात को साबित
करने के लिए एक बिल्कुल ताजा उदाहरण है दिल्ली शहर में एक ढाबा चलने वाले वृद्ध
दम्पति की बुरी अवस्था देख कर एक युवक ने उनकी कुछ मदद कर दी। उनके विडियो का
प्रचार-प्रसार सब जगह हो गया। लोग भी इंसानियत के अतिरेक में आ कर दिल खोल कर मदद
करने लगे। और आज हालात देखे। उस वृद्ध आदमी ने उस युवक पर ही धन के गबन का मामला
दर्ज करवा दिया। खैर उस युवक को वो मिला जिसका वो हकदार था। उस युवक ने खुद मदद की
ठीक है पर उसका प्रचार-प्रसार करके दुसरे लोगो को मदद के लिए प्ररित नहीं करना
चाहिए थे। दूसरी तरफ धन वर्षा होते ही उस वृद्ध का अहंकार जाग गया। दरअसल ये वृद्ध
दम्पति दया का पात्र नहीं था। एक दूसरा उदाहरण देखते है। एक वृद्ध दम्पति, पति-पत्नी
दोनों अंधे। फिर भी संपत्ति के लालच में इनके सभी पुत्रो की हत्या कर दी गई। सुनने
में कैसा लगता है? बहुत बुरा। नफरत होती है उन हत्यारों से जिन्होंने इस अंधे
दम्पति के पुत्रों की हत्या की। पर ये दम्पति महाभारत युग के राजा धृतराष्ट्र और
उनकी पत्नी गांधारी थी। जिनके सौ पुत्रो की हत्या युद्ध में हुई थी। तो क्या ये
लोग दया के अधिकारी थे? जी नहीं। राजा धृतराष्ट्र तो बिल्कुल भी दया का पात्र नहीं था क्यों की
महाभारत का युद्ध उसके कारण ही हुआ था। राजा धृतराष्ट्र के पास हजारो अवसर आए
जब वो अपने मोह से मुक्त हो राज धर्म का पालन करते हुए इस युद्ध के कारण को ही
खत्म कर सकते थे। पर मोह वश नहीं कर सके। मोह के अलावा राजा धृतराष्ट्र को अहंकार
भी था अपनी सेना का। जिस कारण वो खुद युद्ध चाहते थे। ताकि उसके पुत्रो को बार-बार
मिलने वाली चुनौती हमेशा के लिए खत्म हो जाए। पर अधर्म कभी भी धर्म से जीत नहीं
सकता। कर्म का मार्ग ही धर्म का मार्ग है। और सही कर्म का चुनाव कैसे करना है वो
लिखा जा चुका है। दरअसल कर्म करते वक़्त उस कर्म से होने वाले फल या प्रभाव की
चिंता करनी ही नहीं चाहिए। जैसा की श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है, की फल की चिंता
से मुक्त हो कर सम्पूर्ण समर्पण भाव से कर्म के मार्ग पर अडिग हो कर चलने वाले
मनुष्य मुझे बहुत प्रिय है। जिसे निष्काम कर्म योग कहते है। जिसे प्राप्त करने के
लिए भक्तियोग जरुरी है क्यों की इस से ही मन पर नियंत्रण स्थापित होंगा। जिस से
मनुष्य अपनी सभी भावनाओ पर नियंत्रण रख सकता है। हम ये भी कह सकते है की एक मानव
अपनी मानवता पर अंकुश लगा सकता है। ये वाक्य शायद पाठको को हैरान कर दे की मानवता
पर नियंत्रण? जी हाँ। जैसा की मैंने पहले भी लिखा है की मानवता एक विशेषण है। हमारी
जो भी, जितनी भी भावनाएँ है वो सभी मिल कर ही ये विशेषता हमें देती है जिसे हम
मानवता या इंसानियत कहते है। हमारे रिश्ते भी इन्ही भावनाओं से जुड़े होते है। और
हमारा आचरण भी इन से ही प्रेरित होता है। उदाहरण के तौर पर मानवता का मतलब क्या?
दया, करुणा, वात्सल्य, ममता, परोपकार आदि जैसे भाव। लेकिन इंसान के अन्दर काम,
क्रोध, लोभ, मोह, माया और अहंकार आदि जैसी भावनाएँ भी तो होती है। जब हम भक्तियोग
से काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया और अहंकार, आदि भावनाओं पर नियंत्रण रखते है तो
दया, करुणा, वात्सल्य, ममता आदि जैसी भावनाओं पर भी नियंत्रण रखना ही होंगा। जैसा
की पहले भी लिखा गया था। भावहीन मनुष्य। बिना
वजह की भावुकता या अत्याधिक मानवता का प्रदर्शन खुद को कर्म के मार्ग से भटकाता है।
और अगर आपके साथ ऐसा होता है तो आप पहले इंसान नहीं हो। ये सब के साथ होता है। अर्जुन
के साथ भी हुआ था। सभी को ज्ञात है की श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश अर्जुन को दिया
था। ज्ञान प्राप्त करने के बाद मोह, माया, रिश्ते, ममता, प्रेम आदि सभी भावनाओं के
परदे हट गए। वो युद्ध करने के लिए तैयार हो गया। परन्तु अगले ही दिन जैसे ही
पितामह भीष्म उनके आगे आए, अर्जुन फिर से रिश्ते, परिवार, कुल, वंश, पितामह, गुरु,
भाई आदि रिश्तों की भावनाओं में बह गया। अर्थार्त इस ज्ञान का असर एक दिन में ही
हट गया। दरअसल ये ज्ञान इतना गूढ़ है की मानव मन इसे समझ कर भी नासमझ बन जाता है। ज्ञानी
से ज्ञानी व्यक्ति भी इन भावनाओं से बच नहीं सकता। आप रावण को देख ले, इंद्र को
देख ले, भीष्म को देख ले। दरअसल निष्काम कर्मयोग को प्राप्त कर लेने का अर्थ ये नहीं
है की मनुष्य अब इन सब बुराइयों से मुक्त हो गया हमेशा के लिए। ये भावनाएँ हर पल
मानव मन भटकाने का प्रयास करती है। इन भावनाओ पर नियंत्रण से ही मनुष्य कर्म योग
के मार्ग पर चलता है। जो मार्ग आगे निष्काम कर्मयोग तक जाता है। जब आप सिर्फ अपने
कर्म पर ध्यान केन्द्रित करते हो। उस कर्म से मिलने वाले परिणाम की चिंता नहीं
रहती। वर्तमान समय में सबसे बड़ी समस्या ही ये है की मनुष्य का हर काम फल प्राप्त
करने के लिए ही होता है। हम एक भिखारी को दस रूपये भी देते है तो ये सोचते है की
हमें पुण्य मिलेगा। कुछ पाप कम होंगे। गंगा स्नान करने पर भी लोग यही सोचते है की
कुछ पाप कम होंगे। मंदिर में दान करते है और फिर शिलापट्ट पर अपना नाम भी लिखवा
देते है। किसी गरीब की मदद करते है तो फोटो खिचवाते है विडियो बना कर सब को बताते
है की हमने समाज सेवा की। इन सब बातों से क्या पुण्य मिलता है। ये धर्म है? दरअसल
दान करना, परोपकार करना, धर्म है। पर नतीजे के बारे में सोच कर करना अधर्म है। दान-परोपकार
का प्रचार-प्रसार करना अधर्म है। प्रचार-प्रसार वाला दान-धर्म किसी काम का नहीं
होता। कुछ लोग ये तर्क देते है की हम अपने अच्छे कामों का प्रचार-प्रसार दुसरे
लोगों को भी प्रेरित करने के लिए करते है। पर मत करो किसी को प्रेरित। आप अपने
कर्म का मार्ग चुनों। दूसरों को अपने कर्म का मार्ग चुनने दो। मैंने पहले भी
स्पष्ट किया है की हर इंसान को अपने कर्म का मार्ग खुद चुनना पड़ता है।
जैसा की अब तक के पुरे लेख में आप देख
सकता है की मनुष्य का कर्म ही उसका धर्म है। और धर्म वो नहीं है जैसा की हम देखते
है या सुनते है। धर्म वो भी नहीं है जो हमें दिखाया जाता है, सुनाया जाता है,
पढाया जाता है। जिस प्रकार मनुष्य के शरीर के लिए श्वसन क्रिया जरुरी है उसी
प्रकार मनुष्य जीवन के लिए धर्म भी जरुरी है। मनुष्य स्वतंत्र रूप से भी धर्म के
मार्ग पर चल सकता है और किसी संप्रदाय का पंथिक बन कर भी धर्मानुसार आचरण कर सकता
है। वर्तमान समय में धर्म को लेकर जो प्रचलित परिभाषाएँ है वो सब क्या मिथ्या है?
ये निर्भर करता है। की क्या चीज तर्क संगत है और क्या तर्कहीन। अपनी परम्पराओं और
रीती-रिवाज का पालन करना क्या सही है? या गलत ये इस बात पर निर्भर करता है की उसके
पीछे करने वाले की मंशा क्या है। भगवान को प्राप्त करने का एक ही मार्ग है निष्काम
कर्म योग। जिसके बारे में विस्तार से लिखा गया है। अगर किसी परम्परा को या
रीती-रिवाज का पालन किसी भौतिक सुख की चाहत से किया जाता है तो वो गलत है। निष्काम
भाव से किया जाता है तो धर्मानुसार है। मंदिर जाना। पूजा पाठ करना। रामायण-भागवत
का पाठ करना। पानी-दूथ आदि प्रदार्थों को अर्पण करना भी उपरोक्त विचार के अनुसार
ही फल देता है। ज्यादातर रीती-रिवाज भक्तियोग को प्राप्त करने में सहायता करते है।
यहाँ प्रशन ये निकल सकता है की इन सब की जरुरत ही क्या है? भगवान तो कण-कण में है।
हर जीव के अन्दर है। फिर ये सब क्यों? इस का जवाब कुछ उदाहरण से दिया जा सकता है। वायु
सब जगह है। और वायु में जल भी होता है, जो वाष्प की अवस्था में होता है। लेकिन इस
जल का प्रयोग हम पीने के लिए नहीं कर सकते। प्यास बुझाने के लिए जो जल हमें चाहिए
वो तरल अवस्था में होना चाहिए, और वो भी किसी पात्र(बर्तन) में। तरल जल को हम धरती
पर फैक कर किसी को पीने के लिए दे तो वो व्यर्थ है। हम अपने हाथ को समतल रखे और उस
पर जल डाल दे तो वो भी पीया नहीं जा सकता। तो जल पी कर अपनी प्यास बुझानी है तो कुछ
अतिरिक्त प्रयास करने ही होंगे। यही बात प्रभु के मार्ग पर चलने पर भी लागू होती
है। दूसरा उदाहरण देखे। क्या बच्चों को शोर-शराबे वाली जगह पर पढाया जा सकता है। जहाँ
ऊची आवाज में शोर हो रहा हो? गन्दी और बदबूदार जगह? सड़क या फूटपाथ पर बिठा कर? खुल्ले
आसमान के नीचे? तेज धूप या बारिश में बिठा कर पढाया जा सकता है। अगर आप का जवाब
हाँ में है तो फिर हमें स्कूलों-कालेजों की जरुरत ही नहीं है। पर फिर भी हम पढाई
को स्कूलों-कालेजों से जोड़ते है। वहाँ पर भी सुविधाओ को देखते है। जैसे साफ़-सुथरे,
हवादार और रोशनी वाले क्लास रूम होने चाहिए, ब्लैक बोर्ड होने चाहिए, बैंच हो। लाइट-पंखे
हो। पानी और शौचालय का प्रबंध हो आदि। क्यों चाहिए इतना आडम्बर। जबकि पढाई के लिए
सिर्फ छात्र हो, अध्यापक हो और किताबे हो। दरअसल अध्यापक की जरुरत भी नहीं है। बच्चों
को किताबे दे दो, वो खुद पढ़ लेंगे। पढ़ने वाले पढ़ते भी है। पर हर बच्चा ऐसा नहीं कर
सकता। इसलिए इतने तामझाम की जरुरत होती है। पढाई का माहौल बनती है ये सब चीजे। बच्चे
एकाग्रचित हो कर पढ़ सके। एकाग्रता बहुत जरुरी है। वरना मन पढाई में नहीं लगेगा। सच
तो ये भी है की सब बच्चों का मन फिर भी पढाई में नहीं लगता। वो क्लास में हो कर भी
मन से क्लास में नहीं होते। यही सारी बाते धर्म पर भी लागू होती है। भक्तियोग को
प्राप्त करने के लिए मन की एकाग्रता बहुत जरुरी है। और ये सब परम्पराएं और
रीती-रिवाज मन को एकाग्र करने में ही सहायता करते है।
दरअसल मनुष्य की प्रजाति के सामने जो
समस्याएँ है। वो सब भौतिकता के पीछे भागने के कारण उत्प्पन होती है। वर्तमान समय
में हमने भगवान को भी भौतिक जगत की एक चीज मान लिया है। और धर्म का अर्थ भी हम
भौतिक जरूरतें पूरी करने वाली एक विचारधारा के रूप में करते है। जैसे भगवान हमें
खुश रखे। और ख़ुशी के लिए क्या जरुरी है की हमारे पास बहुत सारा धन-दौलत हो, चल-अचल
संपत्ति हो, सुख-सुविधा की हर वस्तु हो। मरने के बाद स्वर्ग मिले, पर हम मरना भी
नहीं चाहते। यही सब चाहिए ना हमें भगवान से? जबकि ये सब शरीर को प्रसन्न रखने वाली
सांसारिक चीजें है। किसी गरीब या लाचार जीव को देखकर हम कहते है की भगवान ने उसे
ऐसा क्यों बनाया। नास्तिक लोग तो ये तर्क भी देते है की अगर भगवान है! अगर उसने
दुनियाँ और इंसान बनाएँ है तो लोगों को गरीब क्यों बनाया। सब को अमीर बना देता। सब
सुख से रहते। ये भेदभाव क्यों किया। पर जिस स्थूल बुद्धि ने सुख-समृद्धि और वैभव
की देवी लक्ष्मी को भी धन-दौलत की देवी मान लिया है। उससे ओर उम्मीद भी क्या की जा
सकती है। जब भगवान की नजरों में किसी जीव के शरीर का ही कोई महत्व नहीं है तो
इंसान की बनाई हुई धन दौलत का क्या महत्व होंगा। ये चीजें अस्थिर मन वाले जीवों के
लिए महत्वपूर्ण होती है। स्थिर बुद्धि वाले जीव तो अपने शरीर से ही मोह नहीं करते,
सांसारिक रिश्तों से ही मोह नहीं रखते तो इन भौतिक वस्तुओं से क्या मोह रखगें। और
यही है असली धर्म का मार्ग।
भगवान उन परिजनों की तरह है जो अपने
बच्चों को गलती करने पर सीख देता है। अपराध करने पर दंडित भी करता है। जबकि हम चाहते
है की भगवान् ऐसे परिजनों की तरह व्यवहार
करे जो अपने बच्चों के बड़े से बड़े अपराध पर भी पर्दा डालने का काम करे। उन्हें
बचाने का काम करे। पर ये बात हमेशा याद रखनी चाहिए की ऐसा कभी नहीं होंगा। गलतियों
की माफ़ी मिल सकती है। पर अपराध के लिए दंड अवश्य मिलेगा।


