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समुद्र में पत्थर का पुल कैसे बनाया गया.........???*

 *समुद्र में पत्थर का पुल कैसे बनाया गया.........???*               लंका के राजदरबार में सन्नाटा था। रावण के सबसे चतुर गुप्तचर , शुक और सारण...

Thursday, May 5, 2016

बेवजह है डिग्री विवाद


बेवजह है डिग्री विवाद

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल जिस तरह से आज कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पढाई और योग्यता जानने के लिए काम कर रहे है , उस से एक बात तो साफ़ है की केजरीवाल का एक मात्र काम मोदी को परेशान करना और बेकार की बातों में उलझा कर रखना है .पहले वो मोदी की उच्च शिक्षा जानना चाहते थे , जब उन्हें बता दिया गया की वो मास्टर डिग्री है तो उनकी स्नातक डिग्री के पीछे पड गए यहाँ तक की दिल्ली विश्वविद्यालय में कुल पति से बात कर ली , और उन्के आश्वासन के बाद खुद उनके पास चले गए की वो मोदी की डिग्री सार्वजनिक करें , उस पर बहाना ये की जनता जानना चाहती है . केजरीवाल को किसने बताया की जनता जानना चाहती है ? जनता ये भी जानना चाहती है की आप की योग्यता क्या है , आप अपने आप को आयकर विभाग का कमिश्नर बताते है जबकि आयकर विभाग कह रहा है की आप क्लर्क थे , कौन झूठ बोल रहा है ? वैसे भी केजरीवाल कितना झूठ बोलते है ये बात अब बताने लायक नहीं रही , फिर भी बेशर्मी है की जाती नहीं .आज तक कितने प्रधानमंत्रियों की डिग्रियाँ सार्वजनिक की गई है , नेहरू की योग्यता क्या था ? शास्त्री, इंदिरा, राजीब, सोनिया, नरसिंहा राव, गुजराल और देव गोडा की डिग्रियाँ और योग्यता की जानकारी है केजरीवाल के पास ? है तो पहले उसको सार्वजनिक करें .

अरे हां केजरीवाल के पास तो हमेशा वो साबुत होते है जो किसी को दिखाए नहीं जाते . अदालत में भी वो सबूत पेश नहीं करते फिर भले ही माफ़ी मांगनी पड़े या जमानत लेनी पड़े .

यक़ीनन केजरीवाल मूर्खो की वजह से ही राजनीति मैं है. पर वो ये न भूले की जनता एक बार मुर्ख बन सकती है बार-बार नहीं . और आप के पीछे तो गाँधी नाम भी नहीं लगा हुआ है


Wednesday, May 4, 2016

मीडिया का दोहरा चरित्र

मीडिया का दोहरा चरित्र

अगस्ता वेस्टलैंड  चोपर डील में इटली की अदालत ने ये माना है की कंपनी ने 45 करोड़ रुपये भारतीय पत्रकारों को दिए समाचारों का प्रबंधन करने के लिए . उन पत्रकारों की जिम्मेदारी थी की वो इस खबर को दबाये, छिपाये और प्रबंध करें ताकि 125 करोड़ रुपये की दलाली को छिपाया जा सके . पैसे देने वाले कंपनी के दो अधिकारी इस वक़्त जेल में है पर भारत में पैसे लेने वाले वो पत्रकार अभी तक आजाद घूम रहे है. इस बात से एक बात तो  साबित होती है की भारत में  पत्रकारिता अपने मूलभूत आदर्शों से दूर हो चुकी है , और भारत के पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल वी. के. सिंह का वो बयान पूरी तरह से सच था जिस में  उन्होंने इस तरह के बिकाऊ पत्रकारों को प्रेस्टीटयूट कहा था. जिसका मतलब होता है खबरों को बेचने वाला . पत्रकारों से ये उम्मीद की जाती है की वो निर्भीक हो कर पत्रकारिता करें.  पूरी तरह से निष्पक्ष हो कर पूरी ईमानदारी से खबरों का पूरा सच जनता के सामने रख दे. अपने निजी स्वार्थ लालच और विचारधारा को अपने काम से दूर रखे .  पर आज कल पत्रकार खबरों को बनाने का काम करते है.  अपनी पसंद और नापसंद के अनुसार खबरों को चलाते है, छिपाते है, बदलते है, महत्वपूर्ण और महत्वहीन बनाते है. कुल मिला कर खबर दिखाने वाले पूरी तरह से खबर बनाने वाले बन जाते है . जिसके पीछे की असली वजह है निजी स्वार्थ. ये स्वार्थ अलग- अलग तरह का होता हैं. जैसे धन लाभ, सत्ता सुख, सरकारी  सुविधाएँ, सरकारी पद, रिश्तेदारी, जान पहचान या किसी और तरह का प्रलोभन. अपनी  राजनीतिक निष्ठा  या  खुद की विचारधाराएँ भी पत्रकारों की निष्पक्षता प्रभावित करती है. कई बार छोटे मीडिया समूह अपने सीमित संसाधनों के कारण बड़े समूहों पर निर्भर करते है और इस कारण भी निष्पक्षता प्रभावित होती है .  दरअसल  किसी भी क्षेत्र में पूरी तरह  पूरी तरह से  निष्पक्ष कोई भी व्यक्ति नहीं हो सकता है.  व्यक्ति की निष्पक्षता जरूरत अनुसार बदलती रहती है . इस बात को समझाने  के लिए मैं वर्तमान राष्टपति प्रणव मुखर्जी और भूतपूर्व राष्टपति प्रतिभा पाटिल का उदाहरण लेता हु. ये दोनों पूरी जिन्दगी कांग्रेस पारी के सदस्य रहे . पूरी निष्ठा से दिन रात कांग्रेस पार्टी की सेवा की और फिर इन्हें देश का प्रमुख पद दे दिया गया . अब अगर कोई ये सोचता है की पल भर में ये अपनी कांग्रेस के प्रति निष्ठा ख़त्म कर देंगे तो गलत है . ये पूरी तरह  निष्पक्ष नहीं हो सकते कही न कही इन के मन में अपनी पार्टी के प्रति आज भी निष्ठा है और उस के अनुसार ये काम भी करते है . यही बात सरकारी अधिकारियों और पुलिस अधिकारियों पर भी लागू होती है, तो पत्रकार इस बात से अछूते कसे रह सकते है . और पत्रकारों द्वारा देश से ग़द्दारी का ये कोई पहला मामला नहीं है .
कारगिल युद्ध के समय भी एक महिला पत्रकार युद्ध क्षेत्र में पहुँच गई थी.  युद्ध पत्रकारिता ने नाम पर उसने सेना की गोपनीय जानकारी दुश्मन देश को पहुँचाई और इस का नतीजा था की एक छोटी से  घुसपैठ एक बड़े युद्ध में बदल गई थी . हम युद्ध जीत गए पर भारी नुकसान हुआ. तत्कालीन अटल सरकार को इस बात की जानकारी थी पर सहयोगियों  के सहारे चलने वाली सरकार कोई कार्यवाही नहीं कर पाई. दूसरी बात अगर कार्यवाही करती तो इस को पत्रकारिता पर हमला , बीजेपी की तानाशाही, हिन्दुत्व जैसे शब्दों से मुद्दा बना दिया जाता .  उस के बाद कांग्रेसी सरकार सत्ता में आई और उस महिला पत्रकार को इतना  मान सम्मान ,  धन , सुख, सुविधा, शोहरत और इनाम दिए गए की मानो अगर ये महिला पत्रकार ना होती तो हम कारगिल युद्ध हार जाते .
मुंबई हमले के समय भी  एक बार फिर हमने पत्रकारिता का देश विरोधी चेहरा देखा जब पत्रकारिता के नाम पर टीवी चैनल सुरक्षा बलों की योजनाएँ , उनकी स्थिति आदि जानकारी का सीधा प्रसारण करते रहे और उस प्रसारण को देख कर आतंकवादियों  के आका जरूरी निर्देश देते रहे , पर तत्कालीन सरकार ने उस वक़्त भी कोई कार्यवाही नहीं की .
और अब ये दलाली का मामला तो खुल कर सामने आ गया है , ये तीन  घटना तो बड़ी है इस के अलावा हर रोज छोटी- छोटी घटना तो होती ही रहती है .
क्या किसी विश्वविद्यालय द्वारा अपने विद्यार्थी को निलंबित करने की घटना और फिर उस विद्यार्थी द्वारा आत्महत्या करना रोहित वेमुला के साथ ही शुरू हुई थी . क्या वेमुला जो मामूली से तनाव से लड़ने की जगह हार मान गया वो नायक बनाये जाने लायक   है . इस से अच्छे वो लोग है जो अपाहिज होने के बाद भी जिन्दगी से हार नहीं मानते उस से लड़ते है और जीतते है .हालाँकि छात्रों द्वारा आत्महत्या करना दुखद है पर क्या मीडिया हर छात्र की आत्महत्या को इस तरह ही सुर्खियाँ बनाता है ? 
क्या भीड़ द्वारा किसी व्यक्ति को मारने की घटना दादरी से पहले कभी नहीं हुई थी ? डाक्टर नारंग की हत्या भी तो लोगों के समूह ने की थी . क्या मीडिया ने दोनों ख़बरों को एक समान तरीके से अहमियत दी ? क्या फर्क है दोनों हत्याओं में?
अफजल गुरु जिस को भारत की एक स्वतंत्र और संविधानिक संस्था न्यायपालिका ने अलग- अलग स्तरों पर अपना पक्ष रखने का मोका दिया हर बार एक नया कोर्ट , एक नया जज , नए सिरे से मामले की शुरुआत अलग- अलग तर्क पर हर बार जज ने उस को आतंकवादी ही माना और उस को फाँसी की सजा दी.  फिर राष्टपति ने भी उस के अपराध को देखते हुए उस की फाँसी को रद्द नहीं किया , फिर क्यों कुछ लोग उस को शहीद बनाने पर तुले है . उस की फाँसी की सजा को राजनीतिक हत्या साबित करने की कोशिश की जा रही है . क्या ये लोग राष्टपति और न्यायपालिका से भी बड़े है ? और मीडिया उन लोगों को सुर्खियों में ला कर क्या साबित करना चाहती है ?
क्या रविश कुमार बताओगे की जमानत पर रिहा हुए कितने युवकों के इंटरव्यू लिए है अब तक ? किसी का भी नहीं तो कन्हेया कुमार का क्यों ?उस को न्यायपालिका ने सशर्त जमानत दी है की वो दुबारा देश विरोधी नारे नहीं लगाएगा . आखिर क्या योगदान है उस का जो वो समाचारों की सुर्खियों में आ रहा है .वो आदमी जो अपने बीमार पिता से मिलने नहीं जाता पर लालू यादव को दंडवत प्रणाम करता है. नितीश कुमार से 6 लाख रुपये लेता है और बड़ी- बड़ी बाते करता है.  आजादी  गरीबी से ,भुखमरी से , अशिक्षा से आदि- आदि पर अब तक उसने किया क्या है ? कोई एक योगदान बता दीजिये उसका इस देश के लिए, बिहार के लिए , समाज के लिए ,  फिर भी वो सुर्खियों में है तो क्यों ? उस जैसे ना जाने कितने छात्र है इस देश में, जो ज़मानत पर घूम रहे है मीडिया सब को तो नहीं दिखाता. 3000 हजार रुपये मासिक आमदनी वाले परिवार का  30 साल का युवक अभी तक छात्र  ही है.  जबकि इस उम्र में गरीब घर के लड़के काम धंधे में लग जाते है. अपने परिवार का सहारा बनते है. जबकि वो सिर्फ क्रांति की  बाते कर रहा है.   महँगे ब्रांड कपडे पहनता है,  एप्पल आई फ़ोन 6 का उपयोग करता है , विदेशी महंगी कारों में घूमता है, हवाई यात्रा करता है. कहा से आ रहा है ये पैसा? मीडिया दिन रात खबर दिखाती है की कन्हेया कुमार कितना गरीब है पर वो ये क्यों नहीं बताती की उसके हवाई यात्राओं का खर्चा कौन  करता है? वाम पंथी पार्टियां दे रही है ? तो वो चुप क्यों  है . सामने क्यों नहीं आती. चोरी- चोरी  मदद तो वही करता है  जिसने मन में चोर होता है राजनीति में तो कोई किसी को 100 रुपये भी देता है तो 100 बार मीडिया को बताता है. कन्हेया इस धन का उपयोग अपने परिवार और समाज की भलाई में क्यों नहीं करता . वो शुरुआत करें और लोग भी मदद करेंगे.  पर वो दिन रात मोदी सरकार को कोसता रहता है और मीडिया मजे ले लेकर ख़बरें प्रसारित करता है.  वाम पंथी पार्टियों को चीन से मदद मिलती है और अब चीन भारत की खुशहाली या तरक्की के लिए तो धन दे नहीं रहा होगा ?
मीडिया की बनाई हुई दूसरी सनसनी हार्दिक पटेल को देखते है. उन्होंने गुजरात के लिए या अपने पटेल समुदाय के लिए अभी तक क्या किया है ? उनका योगदान सिर्फ इतना है की 12 साल से शांत गुजरात में उन्होंने आग लगवा दी. तोड़ फोड़ दंगे आगजनी और कर्फ्यू.  लगातार 12 साल तक गुजरात में जो काम आतंकी भी नहीं कर पाए थे, वो हार्दिक पटेल ने कर दिया. क्या यही है विकास में योगदान? और क्या इस जैसे युवक मीडिया में हीरो बनने लायक है ?  निष्पक्ष मीडिया की नजरों से देखे तो ये दोनों अपराधी ही है जिन्होंने अपने ही देश का अपने समाज का नुकसान किया है  पर बिकाऊ मीडिया ने इन्हें नायक बना दिया.
इशरत जहाँ और गुजरात के दंगे आज भी मीडिया की सुर्खियों में है पर मालदा और पूर्णिया के दंगे ठन्डे बसते में डाल दिए गए. मीडिया का पक्षपात  इस बात से पता चलता है की बिहार चुनावों में बीजेपी के हारते ही  पत्रकार उत्तरप्रदेश में  दादरी अख़लाक़ के घर पहुँच गए. उसके बेटे का इंटरव्यू लेने और वो भी बेशर्मी से बयान देता है की बिहार की हार मेरे बाप को श्रधांजलि है. इन दोनों घटनाओं का कोई सम्बन्ध नहीं था. दिल्ली में एक डाक्टर की हत्या कर दी गई. अल्पसंख्यक समुदाय के एक फादर जोजेफ के हाथ काट  दिए गए. बिहार में एक अध्यापक को पीट- पीट कर मार डाला गया. मालदा में पुलिस स्टेशन को आग लगा दी गई. पेटा संस्था की एक महिला कार्यकर्ता को दिन दहाड़े कुछ युवकों ने सड़क पर मारा पीटा. पर ये सारी खबरें कभी भी मीडिया की सुर्खियाँ नहीं बनी. संघ और बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्याएँ  तो अभी तक शामिल ही नहीं कि अपने लेख में. तसलीमा नरसीम का अपने देश दे पलायन हो या बांग्लादेश में उदार वादी बलागरो की हत्या हो हमारा मीडिया हर बात पर चुप रहता है.
चार्ल्स हेब्दो के कार्यालय , सिडनी और पेरिस पर हुआ आतंकी हमले के वक़्त हमारा मीडिया ये दिखाने में लगा था की आतंकवाद का धर्म नहीं होता. कुछ मुस्लिम गुरुओं को पकड़ कर पत्रकार ये साबित करने में लगे थे की कुरान अमन का सन्देश देती है. आतंकवाद  को धर्म से ना जोड़े आदि पर जब कांग्रेसी नेताओं ने खुल्ले आम  हिन्दू आतंकवाद शब्द का निर्माण करते है, तो किसी भी पत्रकार की हिम्मत नहीं हुई अपना विरोध प्रकट करने की. किसी भी पत्रकार ने उन्हें नहीं रोका की वो आतंकवाद  को धर्म से ना जोड़े ये गलत है . सब के सब “हिन्दू आतंकवाद “ शब्द को प्रसिद्ध करने में लग गए. बिलकुल वैसे ही जैसे छोटा राजन की गिरफ़्तारी के वक़्त मीडिया में होड़ लग गई थी “हिन्दू डॉन” बोलने की . पर यही मीडिया क्या दाउद इब्राहीम को “मुस्लिम डॉन “ बोल सकती है? जब मीडिया “इस्लामिक आतंकवाद “ या “मुस्लिम आतंकवाद “ शब्द का उपयोग नहीं करती तो “हिन्दू आतंकवाद “ शब्द का उपयोग क्यों किया जाता है ?
इस तरह के  हजारों मामले पड़े हुआ है. मीडिया के दोगले पन के जिस के कारण मीडिया और पत्रकारों की निष्पक्षता पर सवाल उठाना ला जमी हो जाता है. पर हर किसी से सवाल पूछना अपना हक समझने वाले पत्रकार दूसरों के सवालों से इतना क्यों बचते  है ?  अगर आप को दूसरों से सवाल पूछने का अधिकार है तो दूसरों के सवालों का जवाब देना आपका कर्तव्य बन जाता है