कांग्रेस की लगातार
हार, कौन है जिम्मेदार?
उत्तर प्रदेश निकाय चुनावो के साथ ही एक और राज्य कांग्रेस के हाथ से निकल गया।
ज्यादातर लोग भाजपा को मोदी को या अमित शाह को कांग्रेस के इस पतन का कारण मानते
है। कुछ लोग सोनिया गाँधी के पुत्र मोह को भी इस असफलता का कारण मानते है। इसलिए
प्रियंका को लाने की मांग करते है।वैसे ही जैसे कुछ साल पहले राहुल को लाने की
मांग करते थे। वो आए और तब से लेकर लगातार 27 चुनावों में हार कर अपनी योग्यता का
प्रदर्शन कर चुके है।
अगर किसी नेता के
नेतृत्व में कोई दल लगातार 27 चुनाव हार जाता है तो उस नेता का राजनितिक जीवन तो
खत्म ही हो जाता है। पर कांग्रेस पार्टी तो गाँधी परिवार पर ही जिन्दा है और यही
है कांग्रेस के पतन का कारण। दरअसल अपनी हार का कारण कांग्रेस पार्टी चाहे
हिन्दुत्व को माने या हिन्दू आतंकवाद को दोष दे , हिन्दू वोटो के ध्रुवीकरण का
बहाना बनाए या हिंदू वोटबैंक का राग अलापे कोई फर्क नहीं पड़ता कांग्रेस के पतन की
शुरुआत तो उसी दिन हो गई थी जिस दिन इस देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। और
गाँधी-नेहरू जैसे नेता मूक दर्शक बने रहे। बहुत ही मंद गति से और सतह के नीचे पतन
शुरू हो गया था जो अब तेज हो गया है और नजर भी आने लगा है। उस काल में मिडिया आदि
भी तो इतना प्रभावशाली नहीं था। सब कुछ सरकारी नियंत्रण में था। इसलिए कुछ पता नहीं
चलता था। भगत सिंह की फासी का विरोध ना करके, और फिर कांग्रेस में ही आंतरिक
लोकतंत्र की हत्या कर अपनी कब्र खोद ली।
इतिहास पर नजर डाले
1939, जबलपुर अधिवेशन में बहुमत द्वारा चुने गए सुभाष चंद्र बोस को गाँधी ने अपने
कथित प्रभाव का प्रयोग करके इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। ये कांग्रेस
पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र की हत्या थी जो गाँधी और नेहरू ने अपनी जिद पूरी करने
के लिए की। क्यों की अध्यक्ष पद पर वो अपना आदमी बिठाना चाहते थे। इस के बाद एक
बार फिर आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पद के लिए भी अपने प्रिय नेहरू को बनाने
के लिए बहुमत का गला घोटा गया। गांधी ने
उस वक़्त बड़े साफ तौर अपना समर्थन नेहरू के पक्ष में जाहिर कर दिया था। भारत का
भावी प्रधान मंत्री बनने की उम्मीदवारी की आखिरी तिथि 29 अप्रैल 1946 थी। यह
नामांकन 15 राज्यों की कांग्रेस की क्षेत्रीय इकाइयों द्वारा किया जाना था। राज्य
की कांग्रेस समिति ने नेहरू के नाम का समर्थन नहीं किया। बल्कि 15 में से 12
राज्यों से सरदार पटेल का नाम कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित किया गया।
बाकी 3 राज्यों ने किसी का भी नाम आगे नहीं आया। स्पष्ट है कि सरदार पटेल के पास
निर्विवाद समर्थन हासिल था जो उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने के लिए पर्याप्त
था। इसे गांधी ने एक चुनौती के तौर पर लिया।
सरदार पटेल की जगह नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष बना कर पार्टी में
परिवारवाद और वंशवाद की नीव डाल दी। और इस तरह कांग्रेस का पतन निश्चित कर दिया। दरअसल
वो काल जिसे हम कांग्रेस का स्वर्ण काल कहते है वो इसलिए की इस पार्टी का कोई
विकल्प ही नहीं था। कोई नेता नहीं था। कांग्रेस गाँधी-नेहरू परिवार की छवि में जकड
गई है। इस के बाद इंदिरा नेहरू जो फिरोज खान से विवाह कर के इंदिरा गाँधी बन गई थी(फिरोज
खान को नेहरू पसंद नहीं करते थे इसलिए गाँधी जी ने फिरोज को क़ानूनी तौर पर गोद ले
लिया और इस प्रकार फिरोज खान फिरोज गाँधी बन गया। और नेहरू की आपति भी खत्म हो गई)
और इस प्रकार गाँधी नेहरू नाम अब सिर्फ गाँधी परिवार बन गया। दरअसल कांग्रेस की
समस्या ही यही है की ये सिर्फ एक परिवार पर ही निर्भर है। कांग्रेस प्रमुख का पद
एक ही वंश के लिए आरक्षित है। अगर ऐसा नहीं है तो कोई बाते की सीताराम केसरी के
कांग्रेस अध्यक्ष रहते दो चुनाव हुए जिस में कांग्रेस हारी नतीजा उन्हें पार्टी से
निकाल दिया गया। जबकि सोनिया-राहुल के नेत्रत्व में कांग्रेस 24 चुनाव हार चुकी है।
किसे निकाला गया है
पार्टी से बाहर? वो सभी कांग्रेसी नेता जो राहुल-प्रियंका को कांग्रेस अध्यक्ष
बनाने की मांग कर रहे है वो जरा बताए की कांग्रेस के बाकि नेता क्या योग्य
नहीं है? अहमद पटेल, कपिल सिब्बल, गुलाम
नबी आजाद, गोपाल कृष्ण गाँधी, अनिल शास्त्री, अभिषेक मनु सिंघवी आदि नेता क्या
कांग्रेस में साफ़-सफाई का काम करते है? क्या इनमे कांग्रेस अध्यक्ष बनने की
योग्यता नहीं है? कांग्रेस के आधिकारिक
रिकॉर्ड के अनुसार राहुल का राजनितिक जीवन 13 साल पुराना है जिसमे उसने 31 चुनावों
ने कांग्रेस का नेतृत्व किया है और 23 चुनावो ने कांग्रेस को हार का सामना करना
पड़ा। इस प्रदर्शन के बाद तो कोई दूसरी कोई पार्टी राहुल को एक कार्यकर्ता का पद ही
देती पर कांग्रेस सिर्फ गाँधी उपनाम के कारण पार्टी का अध्यक्ष पद दे रही है।
क्या मणिशंकर अय्यर, अहमद पटेल
जैसे नेता जो क्रमशः 28 साल और 40 साल से कांग्रेस की सेवा कर रहे है वो इस पद के
लायक नहीं है? 13 साल का अनुभव 40 साल पर भारी है? 23 चुनावी हार 1977 की जीत
(इंदिरा विरोधी लहर के बावजूद) पर भारी है? क्या अनिल शास्त्री जो राहुल की तरह
पूर्व प्रधानमंत्री के पुत्र है और 28 साल के अनुभवी है, वो योग्य नहीं है
कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए? यही है असली वंशवाद। परिवारवाद। राहुल की मंदबुद्धि
और बेवकूफ वाली छवि को तो कांग्रेस बीजेपी और संघ का सुनियोजित प्रचार बता कर
ख़ारिज कर देती है, पर 23 चुनावी हारो का किस तरह से बचाव करेगी? कांग्रेस पहले
अपनी पार्टी के अन्दर लोकतंत्र की स्थापना करे, फिर देश के लोकतंत्र की चिंता करे। जब तक
कांग्रेस में एक परिवार की चापलूसी बंद नहीं होगी उसका हाल यही रहेगा। अभी आप के
पास राहुल है , प्रियंका है फिर उसके बच्चे रोहन और रेहान है। मजे की बात ये की
इनके नाम के पीछे भी वाड्रा की जगह गाँधी ही लगता है।
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