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Saturday, September 23, 2017

क्या निष्पक्ष है देश का चौथा स्तम्भ?

क्या निष्पक्ष है देश का चौथा स्तम्भ!
देश में असहिष्णुता है? तानाशाही है? माहौल ख़राब है? रहने के लायक नहीं है? आज़ादी, निजता, अभिव्यक्ति खतरे में है? आजकल यही बाते बुद्धिजीवी वर्ग की जुबान पर है। समाचार चैनल, समाचार पत्र, पत्रिकाएँ आदि पर छाईं हुई है। पत्रकारिता जगत के सभी लोग इन खबरों को बुलंद करने में लगे हुए है। पर अपनी बात साबित करने के लिए इन लोगों के पास है क्या? पनेसर, कुल्बर्गी और दाभोलकर के अलावा? अब एक चौथा नाम और इस सूची में जुड़ गया है गोरी लंकेश का। ज्यादा जोर देने पर दो और नाम निकल कर आते है अखलाक और जुनैद का। क्या बस यही हत्याएं है? अत्यचार है? क्या इन के आलावा और कोई अपराध नहीं है चर्चा करके के लायक? अपनी बात को और स्पष्ट करता हूँ।
श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु आज भी एक रहस्य है। राजीव दीक्षित की मृत्यु भी रहस्यमयी है।
फादर जोजेफ के हाथ काट दिए गए थे। डाक्टर नारंग को उनके ही घर में घुस कर मार डाला गया था। पेटा की महिला कार्यकर्ता को बुरी तरह पीटा गया। बिहार में कुछ दलित युवको को मार-पीट कर पेशाब पिलाया गया। पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या कर दी गई। अलीगड़ विश्वविद्यालय में एक महिला पत्रकार के साथ अभद्रता की गई। एक लेखक और पत्रकार कमलेश तिवारी को एक लेख के कारण जेल में डाल दिया गया। बंगाल में तो राम कृष्ण मिशन के एक पुजारी को नंगा करके पीटा गया। कुछ दलित महिलाओ को भी निवस्त्र करके घुमाया गया। केरल में तो 2000 से 2017 तक 160 लोगो की हत्या की गई है जो एक ही संगठन से जुड़े हुए थे।
क्या ये सब घटनाएँ चर्चा का विषय नहीं है? पर इन घटनाओं का तो नाम तक नहीं लिया जाता। ना तो हमारा बुद्धिजीवी वर्ग इस विषय पर कोई बात करता है। और ना ही पत्रकारिता जगत के लोग इस पर अपना मुहं खोलते है। आखिर क्यों? एक दो लोग हो या फिर एक दो बार की बात हो तो ये मान सकते है की भूल गए। याद नहीं रहा। पर लाखो की संख्या है बुद्धिजीवी वर्ग और पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगो की। क्या किसी को भी ये घटनाएँ याद नहीं है। फिर हर बार सिर्फ तीन घटनाओ की ही चर्चा क्यों होती है? यही सवाल हमारे देश में  पत्रकारिता और बुद्धिजीवी वर्ग की निष्पक्षता पर सवाल लगाता है।
अख़लाक़ की मौत से दुखी हो कर जिस बुद्धिजीवी  ने सबसे पहले अपना पुरस्कार वापिस लौटाया ये वही बुद्धिजीवी था जिसने भोपाल गैस कांड के बाद ये कहा की मरने वाले के साथ मरा नहीं जाता। इतना ही नहीं इन्होने उसी दिन शाम को वहा अपना कार्यक्रम भी किया। जिस बुद्धिजीवी को हजारो लोगो की मौत से फर्क नहीं पड़ा वो एक आदमी की हत्या से इतना दुखी हो गया? फिर कुछ समय बाद डॉ नारंग की भी हत्या कर दी गई परन्तु इस मानवतावादी बुद्धिजीवी ने एक शब्द नहीं कहा। क्यों? अख़लाक़  को लोगो की भीड़ ने मारा, उसके ही घर में, एक मामूली विवाद पर। पर डॉ नारंग की हत्या भी एक समूह ने की, उसके ही घर पर की, उसकी पत्नी और मासूम बेटे के सामने, एक मामूली विवाद पर। क्या फर्क है दोनों घटनाओं में? पर एक खबर को राष्टीय खबर बना दिया गया। दर्जनों पुरस्कार वापस किए गए। संयुक्त राष्ट संघ को पत्र लिखे गए। परन्तु दूसरी खबर? कहा दब गई या दबा दी गई? क्या ये निष्पक्षता की कोई नई परिभाषा है?
भारत के एक बहुत बड़े राष्टीय समाचार पत्र ने अभी हाल ही में एक आवरण कथा प्रस्तुत की जिसमे पनेसर, कुल्बर्गी और दाभोलकर की मामले की प्रगति रिपोर्ट पेश की गई। परन्तु डॉ नारंग का नाम तक नहीं लिया किसी ने। चलो मान लिया की ये एक मामूली आदमी था तो पत्रकार राजदेव रंजन के मामले की प्रगति रिपोर्ट ही शामिल कर लेते अपनी आवरण कथा में। कभी शास्त्री जी या राजीव दीक्षित की रहस्यमयी मौत पर भी कोई खोज पूर्ण आवरण कथा प्रस्तुत कर देनी चाहिये। 17 सालो में 160 हत्या ये भी एक अच्छा विषय है आवरण कथा बनने के लिए। इस समाचार पत्र ने अपनी वेबसाइट पर पदमावती पर भी एक आवरण कथा प्रस्तुत की थी की वो असली महिला थी काल्पनिक पात्र नहीं थी।  परन्तु आज तक वो रिपोर्ट अपने समाचार पत्र में प्रकाशित नहीं की, बल्कि उसको अपनी वेबसाइट से भी हटा दिया। क्या इस प्रकार ये समाचार पत्र अपने निष्पक्षता के दावे को सिद्ध करता है? दुसरे समाचार पत्रों, पत्रिकाओ और समाचार चैनलों का भी यही हाल है।
जब छोटा राजन जैसे अपराधी को पकड़ा गया तो पूरा बुद्धिजीवी वर्ग और पत्रकारिता जगत लग गया “हिन्दू डॉन” शब्द ले कर उसका प्रचार करने। हर समाचार पत्र, हर पत्रिका, हर चैनल “हिन्दू डॉन” शब्द का प्रयोग करता रहा। ऐसा लग रहा था की उस अपराधी का पूरा नाम ही “हिन्दू डॉन छोटा राजन” हो। जबकि अबू सलेम के मामले में किसी ने “मुस्लिम डॉन अबू सलेम” का प्रयोग नहीं किया? अगर हिन्दू होने के कारण राजन के नाम के साथ “हिन्दू डॉन” का प्रयोग करना जायज है तो अबू सलेम, छोटा शकील, और दाउद इब्राहीम के नाम के आगे “मुस्लिम डॉन” का प्रयोग क्यों नहीं किया जाता? इसी तर्ज पर प्रज्ञा, असीमानंद, पुरोहित जैसे हिन्दू नामो के कारण अगर हिन्दू आतंकवाद को मान्यता मिल सकती है तो लादेन, जवाहिरी, अफजल, याकूब आदि नामो के कारण “मुस्लिम आतंकवाद” या “इस्लामिक आतंकवाद” को मान्यता क्यों नहीं देता हमारे देश का निष्पक्ष बुद्धिजीवी और पत्रकारिता वर्ग?
 हम सब जानते है की जब भी कोई आतंकवादी हमला होता है या कोई आतंकी खुद अपने काम को अल्लहा, खुदा, इस्लाम, जेहाद या इस्लामिक राज्य से जोड़ भी दे तो भी हमारे देश का यही वर्ग पूरा जोर लगा देते है की आतंक का कोई धर्म नहीं होता, धर्म आतंक नहीं सीखाता आदि-आदि। इसी वर्ग के सामने जब तत्कालीन सरकार “हिन्दू आतंकवाद” शब्द की रचना कर रही थी तब इन्होने विरोध क्यों नहीं किया? कोई मार्च नहीं निकाला, पुरस्कार नहीं लौटाए। आखिर ये किस प्रकार की निष्पक्षता है? अगर आतंकवाद इस्लामिक नहीं होता, मुस्लिम नहीं होता तो फिर हिन्दू कैसे हो सकता है? हर वो पत्रकार या बुद्धिजीवी जो मुस्लिम आतंकवाद शब्द का विरोध करता है वो हिन्दू आतंकवाद शब्द पर चुप क्यों रह जाता है?
सरकार का क्या काम होता है। अवैध काम को रोकना। अवैध मानव, अवैध शराब, अवैध अड्डे आदि। हर वो काम जो अवैध है उसको रोकना, बंद करना, उस काम से जुड़े लोगो को सजा दिलवाना ये हर सरकार का काम है। हमने कभी ये बहस होते हुए नहीं देखी की सरकार ने अवैध शराब का काम बंद करवा दिया जिस कारण हजारो लोग बेरोजगार हो गए। कभी आपने सुना है की कोई अवैध धंधा बंद होने पर उस से जुड़े लोगो के बेरोजगार हो जाने पर बहस हुई हो? या इस वजह से सरकार पर वो अवैध काम फिर से शुरू करने का दबाव बनाया गया हो? नहीं ना। तो फिर जब सरकार ने अवैध बुचडखाने बंद किये तो पत्रकार या बुद्धिजीवी किस लिए इतना शोर मचा रहे थे? खुद अपने मुहँ से कह रहे थे अवैध बुचडखाने और फिर इन को बंद करने पर बेरोजगारी संकट का रोना भी रो रहे थे। आखिर क्या चाहते थे ये लोग। ये खबर महीनो तक सुर्खियों में रही। सरकार को खलनायक की तरह प्रस्तुत किया हमारे देश के पत्रकारो और बुद्धिजीवीयों ने।
अमरनाथ यात्रियों पर जब हमला हुआ तो सरकार ने पीड़ित पक्ष और आरोपी पक्ष का धर्म सार्वजानिक कर दिया। इस पर एक मशहूर पत्रकार और फिल्म निर्माता ने एक लेख में बताया की पत्रकारिता जगत में एक अलिखित नियम होता था की पीड़ित और आरोपी का धर्म ना बताया जाए ताकि भाई चारा ख़राब ना हो। पर वो ये बताना भूल गए की ये नियम कब था क्यों की गुजरात के दंगो से लेकर अख़लाक़ की मौत तक पूरा पत्रकारिता जगत पीड़ित और आरोपी पक्ष का धर्म बार-बार बताते रहे थे। जब ये बात याद नहीं आई की पीड़ित का धर्म सार्वजानिक ना किया जाए। ऊपर लिखी तीन घटनाओ में भी आरोपी पक्ष का धर्म ही बार–बार बताया जाता है की वो हिन्दू है, पर बाकि की जो खबरे मैंने लिखी है और जिन्हे दबा दिया गया है उन पर नहीं बताया जाता की आरोपी पक्ष मुस्लिम है। गुजरात दंगो में आरोपी किस धर्म के है ये बात तो हम 2002 से सुन रहे है। पर मालदा, पूर्णिया और बंगाल के दंगो में आरोपी किस मजहब के है ये नहीं बताया जाता। गुजरात में किसी दलित की पिटाई राष्टीय आपदा बन जाती है पर बिहार में किसी दलित की पिटाई करके उसको यूरिन(मूत्र) पिलाना एक मामूली सी घटना ही मानी जाएगी क्यों की दोनों घटनाओ में पीड़ित पक्ष तो एक ही समुदाय से है परन्तु आरोपी अलग है गुजरात में आरोपी हिन्दू थे तो बिहार में मुस्लिम।
अभी हाल ही में एक समाचार पत्र में उना की ही सकारात्मक तस्वीर प्रकाशित हुई थी परन्तु उस तस्वीर के नीचे जो लिखा था वो अस्वीकार्य था। लिखा था “दलितों की पिटाई के लिए मशहूर गुजरात का उना”। क्या पहचान दे दी उस समाचार पत्र ने गुजरात के उना को? लगता है की उना में तो सिर्फ दलितों की पिटाई ही होती है। अगर ये निष्पक्षता है तो भेदभाव क्या होंगा? इस भेद भाव और पक्षपात पूर्ण समाचारों के एक और उदाहरण दे कर मैं अपना लेख समाप्त करता हूँ। अभी कुल 3 नकली ढोंगी बाबाओ को पकड़ा गया है तो पत्रकारिता जगत इस विषय को उछाल रहा है की सारे बाबा ढोंगी होते है। चोर होते है। सब को जेल में डाल दो आदि। सिर्फ 3 की वजह से लगभग 3000 बाबा दोषी घोषित कर दिए। इसी तर्ज पर 3 आतंकवादियों(अभी तक साबित नहीं हुआ है) के कारण 100 करोड़ से ज्यादा की हिन्दू आबादी को आतंकी घोषित कर दिया तो फिर 30 आतंकवादियों(न्यायपालिका में साबित हो चुके है सजा मिल चुकी है) के कारण 24 करोड़ मुस्लिम आबादी को आतंकी बोलने का साहस क्यों नहीं दिखाया जाता?                                          
                                                          

Friday, September 8, 2017

मनोरंजन

मनोरंजन, किसी भी फिल्म में सबसे जरुरी होता है। एक फिल्म की सफ़लता के लिए तीन चीजे जरुरी है और वो है: पहली मनोरंजन, दूसरी मनोरंजन और तीसरी मनोरंजन। अगर लोगो को शिक्षा चाहिए तो वो स्कूल जाएगे। ज्ञान चाहिए तो संन्यास ले कर तपस्या करेंगे और भाषण सुनना है तो नेताओ के पास जाएंगे और किसी सामाजिक जानकारी के लिए इतने सारे समाचार चैनल है। ये सब मुफ्त के साधन है। अपनी जेब से धन खर्च करके, समय निकाल कर सिनेमा में फिल्म देखने जाने का कारण सिर्फ मनोरंजन ही है। और हर सफलतम फिल्म ने दर्शको का मनोरंजन किया है। कला सिनेमा, व्यवसायिक सिनेमा, अर्थपूर्ण सिनेमा आदि-आदि। ये सारा वर्गीकरण बेकार है। फिल्म सिर्फ अच्छी होती है या बुरी।
अच्छी मतलब मनोरंजक और बुरी मतलब अमनोरंजक बस यही एक चीज है जो किसी फिल्म को सफल या असफल करती है। एक्शन, हारर, रोमांटिक, कॉमेडी आदि जैसी श्रेणियाँ भी दर्शको की पसंद पर निर्भर करती है। अब किसी को “शोले” ठाकुर के बदले की कहानी लगती है तो कोई वीरू, असरानी, जगदीप और बसंती की कॉमेडी के लिए फिल्म को याद करता है। तो किसी को जय और जया बच्चन की गंभीर प्रेम कहानी पसंद आती है।
पर आज कल मनोरंजक फिल्मो का निर्माण हो ही नहीं रहा है। मनोरंजन कहानी से होता है। और वो आज कल लिखी ही नहीं जा रही। अब तो गाने लिखने का काम भी खत्म हो गया क्यों की पुराने प्रसिद्ध गानों को ही नया बना कर प्रयोग किया जाता है। “तम्मा-तम्मा लोगे” इस गाने को ये कह कर रीमेक किया गया की हम “भप्पी लहरी” को सम्मान देना चाहते है। तो सम्मान दो ना! काम भी दो! फिर देखो की किस तरह वो आप की फिल्म में भी “ऊ लाला” जैसा गाना बनाते। असली गाना, पुराने के नक़ल नहीं। पर भारतीय फिल्म उद्योग तो सिर्फ नक़ल पर ही जिन्दा है। पहले “सलीम-जावेद” के समय में भी दूसरी फिल्मो से प्रभावित हो कर कहानिया लिखी जाती थी। फिर ये प्रभावित होने का काम नक़ल में बदल गया और अब तो पूरी डुप्लीकेट मशीन का काम होता है। अगर मूल फिल्म में हीरो ने नीले रंग की levis जींस पहनी है और उस हीरो का साइज़ 36 है तो भारतीय फिल्म में भी हीरो नीले रंग की levis जींस साइज़ 36 ही पहनेगा।अगर हीरो की कमर 36 नहीं है तो हीरो जिम जाएगा, डाइट प्लान फ्लो करेगा और अपनी कमर को 36 करेगा। और ये सब कुछ इस तरह से प्रचारित किया जायगा की फलाने हीरो ने नई फिल्म के लिए इतनी मेहनत की, उतनी मेहनत की, कितना पसीना बहाया आदि। निर्माता तो यही प्रयास करेगा की मूल फिल्म की ही जींस खरीद ली जाये। अपने-अपने वहम होते है। लक्की चार्म। इन सब बेकार की बातों पर करोडो रूपये खर्च किये जाते है पर कहानीकार को देने के लिए पैसे नहीं होते। इसलिए वो भी प्रभावित हो कर या नक़ल करके लिखने की जगह डुप्लीकेशन का काम ही करता है। हालीवुड से ही पटकथा ले लो। हिंदी में बदलने की जरुरत भी नहीं है क्यों की यहाँ भी कहानिया अंग्रेजी में लिखी जाती है। हिंदी लेखको का तो प्रवेश प्रतिबंधित है भारतीय फिल्म उद्योग में। आज कल तो संवाद भी आधे से ज्यादा अंग्रेजी में होते है। तो लेखक को ना तो कहानी को और ना ही संवादों को हिंदी में बदलने की जरुरत पड़ती है। गाने लिखने का काम भी अब खत्म ही समझो, पुराने गानों को ही रीमिक्स करो। उसके बाद सन्नी, करीना, कैटरीना, जैकलिन मलायका आदि जैसी हजारो हीरोइने है आइटम सोंग के लिए, फिर एक प्रमोशनल सोंग, अंत में हन्नी सिंह जैसे किसी सिंगर का एंडिंग सोंग, लन्दन, पैरिस से ड्रेस डिजाइनर, और मेकअप डिजाइनर बुला लो। मिडिया के साथ तो पहले ही बात हो जाती है। और बस तैयार है एक फिल्म। फिल्म को दर्शक ना मिले तो सेंसर बोर्ड को दोष दो, सरकार की नीतियों को दोष दो, वैट-gst जैसे करो को दोष दो, पाइरेसी को दोष दो, सिनेमाघरों को कम संख्या को दोष दो, सिनेमाघरों में ना मिलने वाली मूलभूत सुविधाओ को दोष दो, कुछ ख़ास संगठनो(ज्यादात्तर हिन्दू संगठनो) को दोष दो, टीवी, इन्टरनेट और लोगो की उदासीनता को दोष दो। पर अपनी घटिया फिल्म के बारे में एक भी शब्द नहीं सुनेंगे।
जब दर्शक मूल फिल्म पहले ही देख चुके है तो आपकी घटिया रीमेक को कोई क्यों देखेगा? सोंग के नाम पर हिरोइनों का नंगा नाच देखने के लिए? पर वो तो टीवी और इन्टनेट पर देख लिया, मुफ्त में। इन गानों पर दर्शक कई बार नाच भी चुके होंगे, क्यों की इस प्रकार के गाने डीजे, डिस्को, पब, बार आदि में बजते ही है। निर्माता ये समझ लेता है की गाना हिट हो गया तो फिल्म भी हिट हो जायगी। जो उसकी गलती है। आप की फिल्म में तो चोचले थे, मनोरंजन कहा था। मनोरंजन हमेशा कहानी से ही आता है। “बाहुबली” दोनों भाग को ही ले या ग़दर, घायल, हम आपके है कौन, दिल वाले दुल्हनिया ले जायगे या शोले आदि एक लम्बी लिस्ट है सफलतम फिल्मो की। बोबी के लिए तो विशेष बसे चलती थी। आवारा, श्री 420, मुगलेआजम आदि फिल्मो ने तो सिनेमाघरों में आग लगा दी थी। आज कल के फिल्मकार  बहाने बनाते है जो उपर लिखे है। तो ज्यादा पुराणी बात नहीं करते। बाहुबली दोनों भाग सफलतम फिल्म है। क्या इस वक़्त सेंसर बोर्ड नहीं था? सरकार की नीतिया बदल गई थी? वैट-gst जैसे कर नहीं थे? पाइरेसी  बंद हो गई थी? सिनेमाघरों को संख्या ज्यादा हो गई थी? या टीवी, इन्टरनेट खत्म हो गई थे जो लोग सिनेमाघरों की तरफ दौड़ पड़े? ग़दर फिल्म की भी पाइरेसी हुई थी। केबल वाले टीवी पर दिखाने भी लगे थे। पर फिर भी लोग सिनेमा गए। क्या था इन सब सफल फिल्मो में? हन्नी सिंह, सन्नी लियोन थे या आइटम सोंग,प्रमोशनल सोंग जैसी बेकार की चीजे थी?एक उदाहरण देता हूँ। “आशुतोष गोवारिकर ने “लगान फिल्मे की कहानी पर काफी शोध की, ब्रिटिश कालीन भारतीय गावं का माहौल बनाने पर। नतीजा पूरी फिल्म में हीरो हिरोइन एक-दुसरे से लिपटे-चिपटे नहीं, कोई चूमना-चूसना नहीं हुआ फिल्म में। पर “मोहनाजोदारो में हीरो-हिरोइन का चुम्बन सीन डाल दिया। वो शायद ये भूल गई की सिंधु सभ्यता ब्रिटिश काल से भी पुरानी थी उस काल में भी महिलाए किसी से चुम्मा-चाटी नहीं करती थी। शोध की कमी की वजह से शहरी सभ्यता एक मामूली से गाव जैसी लगती है पूरी फिल्म में। पाठक जानते ही है की लगान और मोहनाजोदारो के परिणाम क्या थे। तो फिल्मे चोचलो से नहीं चलती मजबूत कहानी से चलती है। कहानी जो दर्शको में उन्माद जगा दे। ताकि वो दौड़ पड़े सिनेमा घरों की तरफ। आज कल फिल्म के रिलीज होने से पहले ही उसके टीवी अधिकार सिर्फ इसलिए बेच दिए जाते है क्यों की फिल्मकार को पता है की उसकी फिल्म नहीं चलेगी। इसलिए पहले ही बेच दी, पैसा कम लो।
“हम आपके है कौन “ 1994 में आई थी और उसका सबसे पहले टीवी पर प्रदर्शन 2000 में हुआ। ये होती है सफलता। और आज कल “pk” जिसके बारे में कहा जाता है की 350 करोड़ कमाए है। वो 3 महीने के बाद ही टीवी पर दिखाई जाने लगी। सिर्फ 3 महीने लगे सिनेमाघरों से निकाल कर टीवी के (मुफ्त के) प्रदर्शन पर। फिर भी ये सफलतम फिल्म है?
आजकल के फिल्मकारों का मूल मकसद धन कमाना है अच्छी फिल्म बनाना नहीं है। वो चाहते है की दर्शक सिर्फ टिकट खरीद ले, फिर भले ही वो फिल्मे देखने आये या ना आये, बीच में चला जाए, बोर हो जाये इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता क्यों की सिनेमा टिकट पर रिफंड जैसा कोई नियम नहीं होता। फिल्म पसंद नहीं है तो चले जाओ, पर फिल्म ने तो कमाई कर ली। इसलिए आजकल दर्शक बहुत ही सोच समझ कर सिनेमा जाता है। यहाँ पर उन दर्शको की बात हो रही है जो फिल्म देखने जाता है। पैसे के घमंड में चूर लड़के –लडकिया, प्यार के लिए जगह की तलाश में निकले या इस ही तरह के दर्शको को तो चाहे कुछ भी मत दिखाओ। वो तो फिर भी पुरे तीन घंटे हाल में बैठ कर अपना काम करेंगे ही। इनको फिल्मो से मतलब नहीं होता। और इन्ही दर्शको के लिए वो सारे चोचले फिल्मो में डाले जाते है। इसलिए असली दर्शक सिनेमा से हट गया।
90 के दशक तक पुराने फिल्मकार अपनी धार खो चुके थे। अमिताभ बच्चन जैसे महान हीरो भी उम्रदराज हो रहे थे। “हम” और “खुदा गवाह” ही आखरी सफलतम फिल्म थी। उस समय गुलशन कुमार का उदय भी हो रहा था। ये इंसान पुरानी लीक से हट कर नई परम्पराओं का निर्माण कर रहा था जो पुराने फ़िल्मी वर्ग को पसंद नहीं था। फिल्म उद्योग की चमक धमक और धन दौलत को देख कर डान आदि भी हफ्ता वसूली और फिरौती वसूलने लग गए थे। जबकि गुलशन कुमार पुरे देश से प्रतिभाओ को फिल्म उद्योग में ला रहे थे। एक मशहूर डॉन को गुलशन कुमार का इस प्रकार खुल कर एक विचारधारा का समर्थन करना भी पसंद नहीं था। और उनकी वजह से उद्योग एक विचारधारा के लोगो के हाथ से निकाल रहा था। इस सब उलझन में गुलशन कुमार की हत्या करवा दी गई। बाकि दुसरे उदारवादियो को भी डरा धमका कर चुप रखा गया या मरवा दिया गया। और इस प्रकार फिल्म उद्योग पर एक ही विचारधारा के लोगो का मानो कब्ज़ा हो गया। फिल्म उद्योग ने सिर्फ ख़ास यूनियनों से ही लोग लिए जाने लगे, उन का प्रचार होने लगा। अपराधी डॉन ने भी अपना काला धन सफ़ेद किया। तत्कालीन कांगेसी सरकार तो सो ही रही थी। ओर इस प्रकार एक ही मानसिकता का गुलाम बन गया हमारा फिल्म उद्योग। शोषण, भाई-भतीजावाद, परिवारवाद ने बर्बाद कर दिया भारतीय फिल्म उद्योग। इन सब का उदाहरण के साथ वर्णन करता हूँ, ताकि आप को समझने में आसानी हो।
शाहरुख खान को बादशाह कहा जाता है, सुपर स्टार कहा जाता है किंग आदि ना जाने क्या क्या कहा जाता है। उन की आखिरी सफलतम फिल्म 2013 में “चेन्नई एक्सप्रेस” थी। उस के बाद 5 साल में एक भी सफल फिल्म नहीं। हर फिल्म पिटी। कैसे सुपरस्टार है, किंग है जो अपने दम पर फिल्म को सफल भी नहीं कर पाता? सुपरस्टार तो अमिताभ बच्चन थे जिनकी “कालिया” जैसे घटिया फिल्म भी सफलतम फिल्म थी क्यों की हीरो अमिताभ बच्चन थे। सलमान भी अपने दम और नाम से घटिया फिल्म “tubelite” को सफल नहीं कर पाए। कैसे सुपर स्टार है ये? आगे देखिये अमीषा पटेल जिसकी पहली फिल्म “कहो ना प्यार है”, सफलतम फिल्म थी। दूसरी फिल्म “ग़दर” भी सफलतम थी। तीसरी फिल्म “हमराज” भी सफल हुई पर आज वो हिरोइन कहा है? गुमनाम है। जबकि करीना की पहली तीनो फिल्मे फ्लॉप हुई। उस के बाद की फिल्मे भी फ्लॉप हुए। करीना के नाम जो सफल फिल्मे है भी उसका हक़ भी दुसरो को जाता है जैसे की “गोलमाल” और “सिंघम” आदि। पर फिर भी करीना आज भी सुपर स्टार है। क्यों की वो कपूर खानदान की है। पूरा फिल्म उद्योग , जहान्वी कपूर, सारा अली खान,आदि को अपनी फिल्मो में लेने के लिए खड़ा है पर क्या ये किसी और बाहरी लड़की को लेने की हिम्मत करते है। इस भाई-भतीजावाद, परिवारवाद ने उद्योग के अरबो रूपये का नुक्सान किया है।
इन कलाकारों के कुते तक का खर्चा फिल्मकार देता है लेकिन काम करने वाले तकनीशियनों को उनका मेहनताना भी नहीं मिलता। इसलिए फिल्मे फ्लॉप होती है। एक कहानी लेखक को धन नहीं मिलेगा तो वो क्यों मेहनत करेगा? नक़ल ही करेगा ना। आज फिल्म उद्योग में ऐसे लोग है जो हिंदी कहानी को देखते ही फैंक देते है। मतलब हिंदी भाषी कहानीकार नहीं चाहिए। कर दिया न प्रतिभा को नियंत्रित। अंग्रेजी के ही लेखक वो भी वामपंथी संस्थानों से निकले हुए। नतीजा एक जैसी फिल्मे, एक जैसे विषय, एक जैसे तरीका। एक जैसे चोचले और फिर परिणाम भी एक ही आएगा असफल फिल्म।  
लेखक कमलेश पांडे सही कहते है की फिल्म उद्योग को लेखको की बदूआ लग गई है। कमलेश पांडे, शक्तिमान आदि जैसे लेखकों को उनकी प्रतिभा के अनुरूप धन नहीं मिलता। हिंदी बेल्ट के लेखको को फिल्मो में आने ही नहीं दिया जाता। तो नए और अच्छे विचार आएँगे कहा से। आम टूर पर जब कोई फिल्म सफल हो जाति है तो पूरा उद्योग उसकी नक़ल करने लग जाता है। जैसे “मर्डर” फिल्म के बाद हर फिल्मकार चुम्मा-चाटी और बेडरूम सीन खुल कर दिखने लगा। एक के बाद एक कई फिल्मे आई। लेकिन “बाहुबली” की सफलता के बाद भी कोई वैसी फिल्म नहीं बना रहा? क्यों? क्यों की बाहुबली फिल्म उद्योग के कथित महान बौधिक्तावाद से बाहर की फिल्म है। इस बार के आइफा अवार्ड में “बाहुबली को बेस्ट फिल्म का अवार्ड ना देकर “उड़ता पंजाब” जैसी घटिया और फ्लॉप फिल्म को अवार्ड दे कर फिल्मकारों ने अपनी उस ही छोटी सोच का नमूना पेश किया है।