क्या निष्पक्ष है देश का
चौथा स्तम्भ!
देश में असहिष्णुता है? तानाशाही है? माहौल ख़राब है?
रहने के लायक नहीं है? आज़ादी, निजता, अभिव्यक्ति खतरे में है? आजकल यही बाते
बुद्धिजीवी वर्ग की जुबान पर है। समाचार चैनल, समाचार पत्र, पत्रिकाएँ आदि पर छाईं
हुई है। पत्रकारिता जगत के सभी लोग इन खबरों को बुलंद करने में लगे हुए है। पर
अपनी बात साबित करने के लिए इन लोगों के पास है क्या? पनेसर, कुल्बर्गी और दाभोलकर
के अलावा? अब एक चौथा नाम और इस सूची में जुड़ गया है गोरी लंकेश का। ज्यादा जोर
देने पर दो और नाम निकल कर आते है अखलाक और जुनैद का। क्या बस यही हत्याएं है?
अत्यचार है? क्या इन के आलावा और कोई अपराध नहीं है चर्चा करके के लायक? अपनी बात
को और स्पष्ट करता हूँ।
श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की मृत्यु आज भी
एक रहस्य है। राजीव दीक्षित की मृत्यु भी रहस्यमयी है।
फादर जोजेफ के हाथ काट दिए गए थे। डाक्टर नारंग
को उनके ही घर में घुस कर मार डाला गया था। पेटा की महिला कार्यकर्ता को बुरी तरह
पीटा गया। बिहार में कुछ दलित युवको को मार-पीट कर पेशाब पिलाया गया। पत्रकार
राजदेव रंजन की हत्या कर दी गई। अलीगड़ विश्वविद्यालय में एक महिला पत्रकार के साथ
अभद्रता की गई। एक लेखक और पत्रकार कमलेश तिवारी को एक लेख के कारण जेल में डाल
दिया गया। बंगाल में तो राम कृष्ण मिशन के एक पुजारी को नंगा करके पीटा गया। कुछ
दलित महिलाओ को भी निवस्त्र करके घुमाया गया। केरल में तो 2000 से 2017 तक 160
लोगो की हत्या की गई है जो एक ही संगठन से जुड़े हुए थे।
क्या ये सब घटनाएँ चर्चा का विषय नहीं है? पर
इन घटनाओं का तो नाम तक नहीं लिया जाता। ना तो हमारा बुद्धिजीवी वर्ग इस विषय पर
कोई बात करता है। और ना ही पत्रकारिता जगत के लोग इस पर अपना मुहं खोलते है। आखिर
क्यों? एक दो लोग हो या फिर एक दो बार की बात हो तो ये मान सकते है की भूल गए। याद
नहीं रहा। पर लाखो की संख्या है बुद्धिजीवी वर्ग और पत्रकारिता जगत से जुड़े लोगो
की। क्या किसी को भी ये घटनाएँ याद नहीं है। फिर हर बार सिर्फ तीन घटनाओ की ही
चर्चा क्यों होती है? यही सवाल हमारे देश में पत्रकारिता और बुद्धिजीवी वर्ग की निष्पक्षता पर
सवाल लगाता है।
अख़लाक़ की मौत से दुखी हो कर जिस
बुद्धिजीवी ने सबसे पहले अपना पुरस्कार वापिस
लौटाया ये वही बुद्धिजीवी था जिसने भोपाल गैस कांड के बाद ये कहा की मरने वाले के
साथ मरा नहीं जाता। इतना ही नहीं इन्होने उसी दिन शाम को वहा अपना कार्यक्रम भी
किया। जिस बुद्धिजीवी को हजारो लोगो की मौत से फर्क नहीं पड़ा वो एक आदमी की हत्या
से इतना दुखी हो गया? फिर कुछ समय बाद डॉ नारंग की भी हत्या कर दी गई परन्तु इस
मानवतावादी बुद्धिजीवी ने एक शब्द नहीं कहा। क्यों? अख़लाक़ को लोगो की भीड़ ने मारा, उसके ही घर में, एक
मामूली विवाद पर। पर डॉ नारंग की हत्या भी एक समूह ने की, उसके ही घर पर की, उसकी
पत्नी और मासूम बेटे के सामने, एक मामूली विवाद पर। क्या फर्क है दोनों घटनाओं में?
पर एक खबर को राष्टीय खबर बना दिया गया। दर्जनों पुरस्कार वापस किए गए। संयुक्त
राष्ट संघ को पत्र लिखे गए। परन्तु दूसरी खबर? कहा दब गई या दबा दी गई? क्या ये
निष्पक्षता की कोई नई परिभाषा है?
भारत के एक बहुत बड़े राष्टीय समाचार पत्र ने
अभी हाल ही में एक आवरण कथा प्रस्तुत की जिसमे पनेसर, कुल्बर्गी और दाभोलकर की
मामले की प्रगति रिपोर्ट पेश की गई। परन्तु डॉ नारंग का नाम तक नहीं लिया किसी ने।
चलो मान लिया की ये एक मामूली आदमी था तो पत्रकार राजदेव रंजन के मामले की प्रगति
रिपोर्ट ही शामिल कर लेते अपनी आवरण कथा में। कभी शास्त्री जी या राजीव दीक्षित की
रहस्यमयी मौत पर भी कोई खोज पूर्ण आवरण कथा प्रस्तुत कर देनी चाहिये। 17 सालो में
160 हत्या ये भी एक अच्छा विषय है आवरण कथा बनने के लिए। इस समाचार पत्र ने अपनी
वेबसाइट पर पदमावती पर भी एक आवरण कथा प्रस्तुत की थी की वो असली महिला थी
काल्पनिक पात्र नहीं थी। परन्तु आज तक वो
रिपोर्ट अपने समाचार पत्र में प्रकाशित नहीं की, बल्कि उसको अपनी वेबसाइट से भी
हटा दिया। क्या इस प्रकार ये समाचार पत्र अपने निष्पक्षता के दावे को सिद्ध करता
है? दुसरे समाचार पत्रों, पत्रिकाओ और समाचार चैनलों का भी यही हाल है।
जब छोटा राजन जैसे अपराधी को पकड़ा गया तो पूरा बुद्धिजीवी
वर्ग और पत्रकारिता जगत लग गया “हिन्दू डॉन” शब्द ले कर उसका प्रचार करने। हर
समाचार पत्र, हर पत्रिका, हर चैनल “हिन्दू डॉन” शब्द का प्रयोग करता रहा। ऐसा लग
रहा था की उस अपराधी का पूरा नाम ही “हिन्दू डॉन छोटा राजन” हो। जबकि अबू सलेम के
मामले में किसी ने “मुस्लिम डॉन अबू सलेम” का प्रयोग नहीं किया? अगर हिन्दू होने
के कारण राजन के नाम के साथ “हिन्दू डॉन” का प्रयोग करना जायज है तो अबू सलेम,
छोटा शकील, और दाउद इब्राहीम के नाम के आगे “मुस्लिम डॉन” का प्रयोग क्यों नहीं
किया जाता? इसी तर्ज पर प्रज्ञा, असीमानंद, पुरोहित जैसे हिन्दू नामो के कारण अगर
हिन्दू आतंकवाद को मान्यता मिल सकती है तो लादेन, जवाहिरी, अफजल, याकूब आदि नामो
के कारण “मुस्लिम आतंकवाद” या “इस्लामिक आतंकवाद” को मान्यता क्यों नहीं देता
हमारे देश का निष्पक्ष बुद्धिजीवी और पत्रकारिता वर्ग?
हम सब
जानते है की जब भी कोई आतंकवादी हमला होता है या कोई आतंकी खुद अपने काम को
अल्लहा, खुदा, इस्लाम, जेहाद या इस्लामिक राज्य से जोड़ भी दे तो भी हमारे देश का
यही वर्ग पूरा जोर लगा देते है की आतंक का कोई धर्म नहीं होता, धर्म आतंक नहीं
सीखाता आदि-आदि। इसी वर्ग के सामने जब तत्कालीन सरकार “हिन्दू आतंकवाद” शब्द की
रचना कर रही थी तब इन्होने विरोध क्यों नहीं किया? कोई मार्च नहीं निकाला,
पुरस्कार नहीं लौटाए। आखिर ये किस प्रकार की निष्पक्षता है? अगर आतंकवाद इस्लामिक
नहीं होता, मुस्लिम नहीं होता तो फिर हिन्दू कैसे हो सकता है? हर वो पत्रकार या बुद्धिजीवी
जो मुस्लिम आतंकवाद शब्द का विरोध करता है वो हिन्दू आतंकवाद शब्द पर चुप क्यों रह
जाता है?
सरकार का क्या काम होता है। अवैध काम को रोकना।
अवैध मानव, अवैध शराब, अवैध अड्डे आदि। हर वो काम जो अवैध है उसको रोकना, बंद करना,
उस काम से जुड़े लोगो को सजा दिलवाना ये हर सरकार का काम है। हमने कभी ये बहस होते
हुए नहीं देखी की सरकार ने अवैध शराब का काम बंद करवा दिया जिस कारण हजारो लोग
बेरोजगार हो गए। कभी आपने सुना है की कोई अवैध धंधा बंद होने पर उस से जुड़े लोगो
के बेरोजगार हो जाने पर बहस हुई हो? या इस वजह से सरकार पर वो अवैध काम फिर से
शुरू करने का दबाव बनाया गया हो? नहीं ना। तो फिर जब सरकार ने अवैध बुचडखाने बंद
किये तो पत्रकार या बुद्धिजीवी किस लिए इतना शोर मचा रहे थे? खुद अपने मुहँ से कह
रहे थे अवैध बुचडखाने और फिर इन को बंद करने पर बेरोजगारी संकट का रोना भी रो रहे
थे। आखिर क्या चाहते थे ये लोग। ये खबर महीनो तक सुर्खियों में रही। सरकार को
खलनायक की तरह प्रस्तुत किया हमारे देश के पत्रकारो और बुद्धिजीवीयों ने।
अमरनाथ यात्रियों पर जब हमला हुआ तो सरकार ने
पीड़ित पक्ष और आरोपी पक्ष का धर्म सार्वजानिक कर दिया। इस पर एक मशहूर पत्रकार और
फिल्म निर्माता ने एक लेख में बताया की पत्रकारिता जगत में एक अलिखित नियम होता था
की पीड़ित और आरोपी का धर्म ना बताया जाए ताकि भाई चारा ख़राब ना हो। पर वो ये बताना
भूल गए की ये नियम कब था क्यों की गुजरात के दंगो से लेकर अख़लाक़ की मौत तक पूरा पत्रकारिता
जगत पीड़ित और आरोपी पक्ष का धर्म बार-बार बताते रहे थे। जब ये बात याद नहीं आई की
पीड़ित का धर्म सार्वजानिक ना किया जाए। ऊपर लिखी तीन घटनाओ में भी आरोपी पक्ष का
धर्म ही बार–बार बताया जाता है की वो हिन्दू है, पर बाकि की जो खबरे मैंने लिखी है
और जिन्हे दबा दिया गया है उन पर नहीं बताया जाता की आरोपी पक्ष मुस्लिम है। गुजरात
दंगो में आरोपी किस धर्म के है ये बात तो हम 2002 से सुन रहे है। पर मालदा,
पूर्णिया और बंगाल के दंगो में आरोपी किस मजहब के है ये नहीं बताया जाता। गुजरात
में किसी दलित की पिटाई राष्टीय आपदा बन जाती है पर बिहार में किसी दलित की पिटाई
करके उसको यूरिन(मूत्र) पिलाना एक मामूली सी घटना ही मानी जाएगी क्यों की दोनों
घटनाओ में पीड़ित पक्ष तो एक ही समुदाय से है परन्तु आरोपी अलग है गुजरात में आरोपी
हिन्दू थे तो बिहार में मुस्लिम।
अभी हाल ही में एक समाचार पत्र में उना की ही
सकारात्मक तस्वीर प्रकाशित हुई थी परन्तु उस तस्वीर के नीचे जो लिखा था वो
अस्वीकार्य था। लिखा था “दलितों की पिटाई के लिए मशहूर गुजरात का उना”। क्या पहचान
दे दी उस समाचार पत्र ने गुजरात के उना को? लगता है की उना में तो सिर्फ दलितों की
पिटाई ही होती है। अगर ये निष्पक्षता है तो भेदभाव क्या होंगा? इस भेद भाव और
पक्षपात पूर्ण समाचारों के एक और उदाहरण दे कर मैं अपना लेख समाप्त करता हूँ। अभी
कुल 3 नकली ढोंगी बाबाओ को पकड़ा गया है तो पत्रकारिता जगत इस विषय को उछाल रहा है
की सारे बाबा ढोंगी होते है। चोर होते है। सब को जेल में डाल दो आदि। सिर्फ 3 की
वजह से लगभग 3000 बाबा दोषी घोषित कर दिए। इसी तर्ज पर 3 आतंकवादियों(अभी तक साबित
नहीं हुआ है) के कारण 100 करोड़ से ज्यादा की हिन्दू आबादी को आतंकी घोषित कर दिया
तो फिर 30 आतंकवादियों(न्यायपालिका में साबित हो चुके है सजा मिल चुकी है) के कारण
24 करोड़ मुस्लिम आबादी को आतंकी बोलने का साहस क्यों नहीं दिखाया जाता?
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