विपक्षी एकता, भारत जलाने
पर क्यों तुली है!
भारत में एक और आंदोलन हो
गया। दलित संगठनो का भारत बंद सफल रहा। खुब हिंसा हुई, आगजनी, तोड़फोड़, और हत्या। दरअसल
इस भारत बंद को आंदोलन ना कह कर उपद्रव ही कहा जाए तो ज्यादा अच्छा है। कुछ समय
पहले एक फिल्म के कारण करणी सेना ने किस तरह का उपद्रव मचाया था। ये भी वैसा ही था।
ये तो अभी शुरुआत है अभी तो ये आग और फैलेगी। इस दलित उपद्रव के प्रतिक्रिया
स्वरूप स्वर्ण संगठन भारत बंद(उपद्रव) करेंगे। फिर ओबीसी संगठन भी भारत
बंद(उपद्रव) करेंगे, विभिन्न राज्यों में तो आरक्षण आंदोलन होते ही रहेंगे। इस बंद
से पहले किसानो ने भी आंदोलन किया था। मजदूरों के अध्यापको के आंदोलन, जेबीटी,
पीजीटी, आंगनवाडी, आशा वर्कर, बेरोजगार और युवा आंदोलन भी अभी अपनी शुरूआती अवस्था
में है या यू कहे की अभी ये अभ्यास कर रहे है।
आप इनमे से किसी भी उपद्रव
की फोटो या विडियो देखे। सब में कॉमन चीज क्या है? वो चीज है लाल झंडे। इस वाले
भारत बंद में भी लाल झंडे, नीले झंडे और एक–दो हरे झंडे भी देखने को मिले। लाल
झंडा तो हर जगह मिलता है। ये लाल झंडे वामपंथी पार्टियों के थे। नीले झंडे बहुजन
समाज पार्टी के और हरे झंडे मुस्लिम पार्टियों के थे। अब सवाल ये उठता है की जो
भारत बंद sc/st एक्ट में बदलाव के विरोध में बुलाया गया था उसमे मुस्लिम समाज क्या
कर रहा था? वामपंथी संगठन क्या कर रहे थे? वामपंथी तो धर्म और जाति में यकीन नहीं
रखते तो उनका क्या काम? और कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी सड़क पर उतर कर हिंसा
करने वालो को, 14 लोगो की हत्या करने वालो को सलाम ठोकते है।
आखिर किसी भी प्रकार की
हिंसा को कैसे न्यायौचित ठहराया जा सकता है एक उदारवादी लोकतंत्र में? क्या ये
विपक्षी गठबंधन की चाल है। सम्भावना तो यही है। जो खेल गुजरात में खेला गया था वही
अब भारत में खेलने की योजना है। भारतीय समाज को अलग-अलग हिस्सों में बाँट दो। वोटबैंक
बनाओ और सत्ता प्राप्त करो। वामपंथी संगठनो द्वारा इस तरह की हरकतो से देश को
कमजोर करने का कारण तो चीन है। भारत को कमजोर कर चीन को ताकतवर बनाओ। हिंदी-चीनी
भाई-भाई की सोच तब भी बेकार थी, आज भी बेकार है और हमेशा बेकार रहेगी। परन्तु
कांग्रेस अपने शहजादे की ताजपोशी के लिए कितना नीचे गिरेगी। आप सोच रहे होंगे की
इसमें कांग्रेस की क्या भूमिका है सरकार तो बीजेपी की है। जिम्मेदारी तो उसकी बनती
है। बीजेपी की सरकार है। और वो पूरी तरह से जिम्मेदार है। उपद्रव को रोकना सरकार
का ही काम होता है। जब लगभग 60 साल कांग्रेस सत्ता में थी, तब भी इस प्रकार के
खूनी उपद्रव होते रहते थे। साम्प्रदायिक हिंसा भी आम बात थी। तब भी बीजेपी को ही
इन सबके लिए जिम्मेदार माना जाता रहा है क्यों की वो विपक्षी दल है और विपक्षी
दलों का काम होता है सरकार को बदनाम करना, उसके मार्ग में रूकावटे डालना, देश में
अलग-अलग समस्याए पैदा करना ताकि सरकार गिरे और उन्हें सत्ता प्राप्त हो। ये वो
तर्क है जो हम पिछले 70 साल से सुनते आ रहे है और इस आधार पर यही कहा जा सकता है
की वर्तमान साकार के सामने जो भी समस्याएँ आ रही है वो विपक्षी गठबंधन के कारण है
इस उपद्रव का कारण विपक्ष का सत्ता प्राप्ति का प्रयास है।
सिर्फ ये एक कारण नहीं है
विपक्ष पर आरोप लगाने का और भी कई तर्क है जिस कारण विपक्ष की भूमिका पर शक होता
है। अब जरा तथ्यों की जांच करे तो पता चलता है की कोई कानून नहीं बदला गया है। sc/st एक्ट में बदलाव नहीं किया है बल्कि पुलिस
की शक्तियों को कम किया गया है ताकि बेगुनाह को जेल में बंद ना होना पड़े। sc/st
एक्ट में आरोपित व्यक्ति की तुरंत गिरफ़्तारी पर रोक लगाई गई है। रोक लगाने वाला
कौन? सुप्रीमकोर्ट ने, 20 मार्च को, अगले दिन इसकी ओपचारिक लिखित प्रति सरकार के
पास आई। तुरंत ही कानून मत्री और अटार्नी जनरल से चर्चा की गई फिर अदालतों में
छुट्टियाँ हो गई। और जिस दिन अदालत खुली उसी दिन बीजेपी सरकार ने पुनविचार याचिका
दायर कर दी। इस से पहले सरकार ने साफ़ कर दिया था की वो भी दलित संगठनो की तरह इस
फैसले का विरोध करती है। वो याचिका भी लगाएगी।
पर संगठनो ने सरकार के कदम
का इंतजार नहीं किया अगर एक दिन भी रुक जाते तो उपद्रव नहीं होता। पर ये तो
योजनाबद्ध तरीके से हुआ। विरोध प्रदर्शन कोर्ट के खिलाफ नहीं हुआ। विरोध बीजेपी का
हुआ, पुतले मोदी जी के जलाए गई। भीम सेना ने तो राम और हनुमान की तस्वीरों तक पर
थूका। राहुल गाँधी ने इस के लिए संघ को जिम्मेदार ठहराया मानो सुप्रीम कोर्ट कोई
संघ की शाखा है। नीले झंडो वाले बसपाईयों इस आगजनी और तोड़फोड़ में हिस्सा लिया और
वो ये भी भूल गए की उत्तर प्रदेश में जब बसपा की सरकार थी तो खुद तत्कालीन
मुख्यमंत्री मायावती ने 2007 में तुरंत गिरफ़्तारी पर रोक लगाई थी। दलित संगठनो को
कोर्ट के फैसले का विरोध करने के लिए कोर्ट के बाहर प्रदर्शन करना चाहिये था। अपने
आंदोलन को झंडा मुक्त रखना चाहिये ताकि ये असली दलित आंदोलन लगे, पर ये हुआ नहीं। तो
यही माना जाए की ये कोई दलित आंदोलन नहीं था बल्कि संयुक्त विपक्ष का बीजेपी को
बदनाम करने और 2019 के चुनाव को जितने के लिए किया गया प्रयोग था। बीजेपी के प्रति लोगो ने दिलो में डर और नफरत
पैदा करो, भारत में धर्म और जाति की राजनीती सब पार्टी करती है परन्तु सिर्फ
बीजेपी पर ही इस तरह के इल्जाम लगते है मसलन गुजरात दंगो के कारण बीजेपी मुस्लिम
विरोधी पार्टी कहलाती है परन्तु सिख दंगो के कारण कांग्रेस को सिख विरोधी पार्टी
कोई नहीं बोलता। इस तरह की कई घटनाएँ है जिन्हें अगर तर्क की कसौटी पर एक समान
नजरिये से देखा जाए पता चले की हम लोग किस तरह दोगलेपन (दोहरा रैवैया) का शिकार
बना दिए गए है। जहाँ तक बात है sc/st एक्ट की तो इसको लागू होने के बाद भी दलितों
का विकास नहीं हो पाया है, ये कानून भी आरक्षण कानून की तरह वंचितों को मुख्यधारा
से नहीं जोड़ पाया। 3 अप्रैल 2018 दैनिक भास्कर अखबार के अनुसार पिछले 10 सालो में
दलितों के खिलाफ हिंसा 60% तक बढ़ गई है, रोजाना 6 दलित महिलाओ से दुष्कर्म होता है
और हर 15 मिनट में एक दलित के साथ अपराध होता है। और केंद्र सरकार इसे रोक पाने
में नाकाम रही। इसमें 4 साल बीजेपी और 6 साल कांग्रेस दोनों की ही सरकारे शामिल है।
70 साल से लागू आरक्षण भी इस पिछड़ेपन को नहीं मिटा पाया। मतलब ये व्यवस्था पूरी
तरह असफल हुई। दरअसल दलित पिछड़ापन एक आर्थिक और सामाजिक समस्या है इस का निवारण
हमें उस प्रकार करना होंगा जिस प्रकार अमेरिका ने अश्वेत पिछडेपन का किया था।
2019 के चुनाव परिणाम आने तक वाला समय भारत और भारतीय समाज के
लिए और भी ज्यादा दुश्वर और हिंसक होने वाला है। सत्तापक्ष को हर पल सचेत रहने की
जरुरत है अगर उन्हें विपक्षी साजिश से बचना है तो.....