भारत और भ्रष्टाचार का इतिहास
2जी घोटाले के सभी आरोपी बरी हो गए। भ्रष्टाचार का ये कोई
पहला मामला नहीं है और आखिरी भी नहीं होंगा। अदालत का आदेश भी कोई चौकाने वाला
नहीं है। भारत में आज तक कभी भी किसी ख़ास आदमी को सजा नहीं हुई है, और शायद कभी
होंगी भी नहीं। दुखद है पर यही सचाई है हमारे देश की।
आजादी के बाद राजनीतिक भ्रष्टाचार का पहला आरोप 1948 में ब्रिटेन में
भारत के उच्चायुक्त वी. के. कृष्ण मेनन पर लगा था। फौज के लिए 2000 जीप खरीदने के लिए
एक निजी कंपनी को 80 लाख रुपए का भुगतान
कर दिया गया। मगर डिलीवरी सिर्फ 155 जीप की ही हुई। वह
कंपनी फर्जी निकली मगर मेनन बेदाग साबित हुए और बाद में रक्षामंत्री भी बने।
1958 में बीमा घोटाला
हुआ। जिसमें वित्तमंत्री टी. टी. कृष्णमाचारी, वित्त सचिव एच.एम. पटेल और एलआईसी अध्यक्ष वैद्यनाथन पर
आरोप लगे. अगले साल उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया की कंपनी भारत बीमा कंपनी में जनता
के जमा 2.2 करोड़ रुपए हड़पने
के आरोप लगे। इस कांड ने ही बीमा कारोबार का राष्ट्रीयकरण करवाया।
1960 में धर्म तेजा ने
सरकार से जहाजरानी कंपनी शुरू करने के नाम पर 22 करोड़ रूपये का कर्जा लिया ओर विदेश भाग गया।
ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के पिता बीजू पटनायक ने 1965 में अपने मुख्यमंत्री
कार्यकाल में एक निजी कंपनी कलिंग ट्यूब्स को सरकारी ठेके देने में पक्षपात के
आरोप में इस्तीफा देना पड़ा था.
इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में नागरवाला बैंक
घोटाले, मारुति उद्योग और कुओ तेल सौदे में उन पर व उनके
बेटे संजय गांधी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे.
नागरवाला पर 1970 में स्टेट बैंक में इंदिरा गांधी की आवाज में फोन करके खुद
को 60 लाख रुपए देने का आदेश सुनाने और फिर जाकर वह
रकम निकाल लेने का आरोप लगा. यह कांड अंत तक अनसुलझा रहा क्योंकि मामले के जांच
अधिकारी तथा नागरवाला दोनों की ही संदिग्ध मौत हो गई.
मारुति उद्योग दरअसल संजय गांधी ने हरियाणा में खोला था
जिसे कार बनाने का लाइसेंस और सरकारी कर्ज व जमीन दिलाने में पक्षपात का आरोप प्रधानमंत्री
इंदिरा गांधी पर लगा। आपातकाल की ज्यादतियां जांचने को बने शाह आयोग ने भी इसे
भ्रष्टाचार करार दिया था.
कुओ तेल घोटाला हांगकांग की कुओ तेल कंपनी से कच्चा तेल की
भविष्य में डिलीवरी लेने के लिए तत्कालीन दाम पर उसे 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर का ठेका दिया गया.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल का दाम चूंकि घटता-बढ़ता रहता
है इसलिए इस सौदे में सरकार को 13 करोड़ रुपए का चूना
लगा। यह रकम इंदिरा-संजय के विदेशी खातों में जमा होने का आरोप तो लगा मगर साबित
कुछ नहीं हुआ।
थाल वैशेट तेल परियोजना का ठेका इतालवी स्नैमप्रोगेटी कंपनी
की सहायक कंपनी को नियम तोड़ कर देने का आरोप 1980 में कांग्रेस की सरकार पर लगा.
महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री ए.आर. अंतुले पर सीमेंट का कोटा
जारी करने के बदले बिल्डरों से धन वसूलने के आरोप लगे. यह वसूली अंतुले इंदिरा
प्रतिभा प्रतिष्ठान ट्रस्ट के लिए चंदे के रूप में वसूलते थे. उन्हें अंतत: पद से
इस्तीफा देना पड़ा.
बोफोर्स और एचडीडब्लू पनडुब्बी कांड में राजीव पर आरोप लगे.
प्रधानमंत्री नरसिंह राव के राज में 1991 में जैन हवाला कांड हुआ जिसमें पक्ष और विपक्ष दोनों के ही
शीर्ष नेताओं पर काला धन लेने के आरोप लगे. अदालत ने अपर्याप्त सबूतो के कारण सबको
बरी कर दिया।
बिहार में 1000 करोड़ रुपए का चारा घोटाला पकड़ा गया जिसमें राज्य के दो
पूर्व मुख्यमंत्रियों लालूप्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्र सहित आधा दर्जन नेता और
नौकरशाह सजा पा चुके हैं। पर वो सब जमानत पर बाहर है और आराम की जिन्दगी जी रहे है।
क्या लालू यादव को देख कर लगता है की उन्हें सजा मिली हुई है? और वो 1000 करोड़
रुपए क्या सरकारी खजाने में जमा हुए?
नरसिंह राव सरकार(मनमोहन सिंह वित्तमंत्री) ने ही आर्थिक
उदारीकरण किया जिसके बाद से घोटालों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा। नरसिंह
राव सरकार पर एनआरआई लखूभाई पाठक द्वारा कागज और कागज की लुगदी की सप्लाई का
लाइसेंस देने के वायदे पर तांत्रिक चंद्रास्वामी को एक लाख डॉलर दिलवाने का आरोप
था. इस मामले से भी राव सरकार 2003 में बरी हो गई।
इसके अलावा हर्षद मेहता-केतन
पारेख-सत्यम-भंसाली-कलकत्ता-शेयर-प्रतिभूति घोटाला, हर्षद मेहता द्वारा राव पर एक करोड़ की रिश्वत खाने का आरोप,
बीजेपी कार्यकारी अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण रिश्वत कांड, टाट्रा ट्रक घोटाला, अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीद घोटाला, महाराष्ट्र सिंचाई, भुजबल-आदर्श हाउसिंग सोसायटी एवं तेलगी घोटाला, यूपी में ताज हेरिटेज
कॉरीडोर-एनआरएचएम-खाद्यान्न घोटाला, हरियाणा में शिक्षक भर्ती घोटाला, केरल में पाम ऑयल आयात-लावलिन तथा सोलर घोटाला, पश्चिम बंगाल-ओडिशा-असम में शारदा चिटफंड
घोटाला-नारद स्टिंग कांड, सहारा शेयर घोटाला, आंध्र प्रदेश-कर्नाटक-नोएडा जमीन घोटाले, कर्नाटक-झारखंड-गोवा-छत्तीसगढ़-ओडिशा तथा कोलगेट
खनन घोटाले एवं कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, कोयला खान आवंटन, नेशनल हेराल्ड केस आदि
लंबी सूची है राजनीतिक भ्रष्टाचार की।
इन तमाम घोटालों के कारण आम जनता के हिस्से के खरबों रुपए
घोटालेबाजों की जेब में गए. आम आदमी के खून-पसीने की कमाई पर ये एक राजनितिक डाका
ही माना जाएगा। ये करने वाले ज्यादातर नेता ही हैं। पर किसी को सजा नहीं हुई। हालाँकि
अब तक लालू यादव, जगन्नाथ मिश्र, ओमप्रकाश चौटाला, मधु कोड़ा और जयललिता सहित महज पांच पूर्व मुख्यमंत्रियों
को ही सजा सुनाई गई है। पर सब जमानत पर बाहर है। इन्हें देख कर लगता ही नहीं की ये
सजा काट रहे है। किसी भी मामले में घोटाले की रकम की वसूली नहीं हुई। जिसका अर्थ
ये है की उस घाटे की भरपाई आम जनता से ही की गई। क्या ये न्याय हुआ?
राजनीतिक भ्रष्टाचार को काबू करने के लिए जयप्रकाश नारायण, और अन्ना हजारे ने आंदोलन चलाया मगर किसी को
सफलता नहीं मिली। बल्कि इन आंदोलनों से निकलने वाले ज्यादातर नेता खुद इस भ्रष्टाचार
का हिस्सा बन गए। अन्ना का लोकपाल बनाने का सपना उन्हीं के शिष्य अरविंद केजरीवाल
ने ठंडे बस्ते में डाल दिया। केंद्र सरकार भी लोकपाल की स्थापना की दिशा में अब तक
कुछ भी ठोस नहीं कर पाई। लोकपाल विधेयक 1969, 1971, 1977, 1985,
1989, 1996, 1998,
2001, 2005, 2008, 2011
और 2013 में पेश किया जा चुका है। पर आगे क्या ? पिछले 48 साल से संसद में ही भटक
रहा है।

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