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Wednesday, December 20, 2017

विचारधारा के प्रकार और इनके बीच का फर्क

मेरी किताब “इतिहास और मिलावट” का अंश 

विचारधारा तीन प्रकार की होती है और ये है :
दक्षिणपंथी
वामपंथी
उदारपंथी
दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगो को राष्टवादी, फासिस्ट, हिटलरवादी, कट्टरपंथी, चरमपंथी, पाखंडी, आर्यवादी, सांप्रदायिक कहा जाता है। भारत में तो इन्हें संघी, भाजपाई, नकली देशप्रमी, और हिन्दू आतंकवादी भी कहते है। ये सबसे पुरानी विचारधारा है दुनिया की।
वामपंथी विचारधारा के लोगो को परिवर्तनवादी, मार्क्सवादी, लेनिनवादी, समाजवादी, माओवादी नक्सली आदि कहा जाता है। काल मार्क्स इसके जनक थे और इन लोगो का सबसे पहला सफल प्रयोग रूस में सन 1917 में हुआ था।
उदारपंथी विचारधारा के लोग लोकतंत्र समर्थक, उदारवादी, प्रगतिशील, आधुनिक आदि कई नामो से जाने जाते है। हालाँकि भारत के अन्दर उदारपंथी, वामपंथियों की एक शाखा की तरह से ही संचालित होती है। क्यों की इनका दुश्मन एक ही है दक्षिणपंथी विचारधारा। एक उदाहरण देखते है।
सड़क पर कचरा पड़ा है। दक्षिणपंथी आया। सारा कचरा साफ़ किया। फिर मिडिया को बुला कर अपना काम सब को दिखाने का प्रयास किया। किसी ने देखा किसी ने नहीं देखा।
सड़क पर कचरा पड़ा है। वामपंथी आया। हड़ताल शुरू कर दी। अपने समर्थको को बुला लिया जाम, आगजनी, तोड़फोड़। मिडिया सब कुछ दिखा रहा है। सरकारी सफाई कर्मचारी आए कचरा साफ़ किया। काम पूरा हुआ खूब प्रचार हुआ।
सड़क पर कचरा पड़ा है। उदारपंथी आया। आंदोलन शुरू कर दिया। सरकारी अकर्म्यता(काम ना करने की आदत) का ढोल सब जगह बजाया। मिडिया तो सब कुछ दिखा रहा ही है। उदारपंथी अब प्रसिद्ध हो चुका है। कचरा तो कर्मचारी ही साफ़ करेंगे।
एक और छोटे से उदाहरण से इनका फर्क समझते है। दक्षिणपंथी मानते है सबसे योग्य व्यक्ति राजा बनेगा। वो सब पर शासन करेगा। वामपंथी मानते है की सब लोग समान है तो ना कोई राजा ना कोई प्रजा। इसके लिए ये लोग विभिन्न संगठन बनाते है। जैसे किसान, मजदूर ,कर्मचारी, कामगार, दिहाड़ी मजदूर आदि संगठन। इन संगठनो के प्रधान और दुसरे सदस्य भी होते है। ये सब मिल कर एक आदमी को नियुक्त करते है और वो देश का प्रधान बन जाता है। उदारपंथी मानते है की सब लोग मिल कर एक नेता का चुनाव करे फिर वो नेता नियमित समय तक सब पर राज करे। उस के बाद जनता एक बार फिर से चुनाव करे। पर देखा जाए तो तीनो ही व्यवस्थाओ में एक शासक जरुरी है। मतलब सब लोग समान हैका आदर्श तो खत्म हो ही जाता है। माना की राजा निरंकुश हो सकता है, पर वामपंथी और उदारपंथी व्यवस्था में भी तो राष्टपति या प्रधानमंत्री निरंकुश हो सकता है? अगर क्रूर शासको का जिक्र किया जाये तो दक्षिणपंथी हिटलर, वामपंथी स्टालिन और माओ है। लोकतंत्र में भी आपातकाल लगाना कोई नई बात नहीं है। भारत में भी तो 1977 में इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगाया गया था। क्या जनता अपने शासक को रोक पाई थी? नहीं तो फिर सब समानका आदर्श कहा गया?
 जहाँ तक बात इन विचारधाराओ में दुश्मनी की है तो उसके लिए हमें इतिहास की संक्षेप में जानकारी लेनी पड़ेगी। 1917 रूस में ज़ार शासको का राज था जो दक्षिणपंथी थे। और मार्क्स के आदर्श और समाजवादी विचार जनता को बहुत ही अच्छे लगते थे। एक ऐसा समाज जहाँ सब लोग समान होये विचार हर किसी को पसंद आएगा। आखिकार फ़रवरी 1917 में वामपंथियों ने रूस की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया। और एक नेता और अपना प्रधान चुन लिया। पर सत्ता मिलते ही क्या हुआ? सारे आदर्श हवाहो गए और वो नेता खुद तानाशाह बन गया। आखिरकार अक्तूबर में(सिर्फ 9 महीने बाद) एक रक्तरंजित क्रांति के जरिये उस तानाशाह को हटाया गया और लेनिन को सत्ता दी गई। वामपंथी आदर्श सत्ता सुख के 9 महीनो में ही समानता को छोड़ तानाशाही में तब्दील हो गया। वामपंथियों के इस सफल आन्दोलन के बाद तो ये तेजी से पूरी दुनिया में फैला। और इस फैलाव को रोकने का काम किया हिटलर ने। ये वामपंथ पुरे यूरोप को अपने प्रभाव में ले लेता लेकिन हिटलर इसके मार्ग में दीवार बन गया और वामपंथदक्षिणपंथ के बीच की नफरत बढती ही गई। यही कारण था की पूर्वी यूरोप जो वामपंथ के प्रभाव में थे वो गरीब ही रहे जबकि पश्चिमी यूरोप के लोग धनवान बन गए। हालाकि वो लोग इस के लिए कभी हिटलर का एहसान नहीं मानेगे क्यों की इतिहास में हिटलर का नाम ही इतना बदनाम किया गया है।
भारत में हिटलर को फ़ासीवादी(फासिस्ट) कहा जाता है जबकि हिटलर नाजीवाद का जनक था। फ़ासीवाद का जनक था इटली का मुसोलिनी। परन्तु मुसोलिनी के बारे में भारतीय इतिहास में बहुत कम जानकारी है और इस का कारण ये है की मुसोलिनी इटली का था और वर्तमान काल में भारत की सबसे पुरानी पार्टी की राजमाता खुद इटली की है। साथ ही इनके और उसके पूर्वजो के आपस में सम्बन्ध थे। इसी प्रकार स्टालिन और माओ के बारे में भी नहीं बताया जाता क्यों की ये वामपंथी नेता है। स्टालिन ने तो अपनी ही सेना के आदमियों को मारने का हुक्म दे रखा था और माओ ने तो चीन में लाखो चीनी नागरिको को सिर्फ इसलिए मरवा दिया क्यों की वो लोग उस से असहमत थे। असहमति के मामले में माओ की नीति स्पष्ट थी। आज जो असहमत है कल वो विद्रोही बन सकता है इसलिए उस को खत्म कर दो। माओ ने समाजवाद पर नए सिरे से काम किया। इतना की इसका नाम ही माओवाद पड़ गया। भारत में भी वामपंथियों की दो शाखाये है माओवादी और मार्क्सवादी।
दरअसल एक वक़्त था जब आधी दुनिया पर वामपंथियों का कब्ज़ा था। जिन देशो में ये विपक्ष में थे वहा भी इनकी मर्जी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता था। राष्टवादी हाशिये पर धकेल दिए गए थे। और वामपंथी हर जगह अपना दबदबा मजबूत कर रहे थे फिर इन्ही वामपंथियों में से एक शाखा निकली उदारवादियो की। छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी।
भारत  में आजादी के बाद राज वयवस्था छद्म धर्मनिरपेक्षतावादीयों के हाथों में आ गई और पूरी शिक्षा प्रणाली पर इन वामपंथियों ने कब्ज़ा कर लिया । आज भी भारत की पूरी शिक्षा प्रणाली में 70 प्रतिशत तक वामपंथी है। 25-30 प्रतिशत पर छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी। इस लिए इतिहास से मुसोलिनी का फासिस्ट गायब हो गया। माओ के अत्याचार गायब हो गए। स्टालिन की अपने ही सैनिको के प्रति क्रूरता गायब हो गई।
और भी बहुत कुछ गायब हुआ है इतिहास से जो आगे भी बताया जाएगा। पर अगर आप मेरी अभी तक की बातो से सहमत नहीं है तो एक उदाहरण देता है। वर्तमान काल का ही। राजस्थान सरकार ने अपने पाठ्यक्रम में महाराणा प्रताप पर एक अध्याय शामिल किया तो कांग्रेस के ही युवा सांसद ने ये ब्यान दे दिया की संघ अपने लोगो को इतिहास में शामिल कर रहा है। एक उच्च शिक्षित युवा नेता और इस प्रकार का ब्यान? क्या महाराणा प्रताप संघ के आदमी थे? क्या उस काल में संघ था भी? दरअसल महाराणा प्रताप के काल में तो संघ के संस्थापको के पूर्वज भी पैदा नहीं हुए थे। तो वो संघी कैसे हुए? इस प्रकार की और भी बाते आती रहती है। जैसे भगत सिंह आतंकवादी थे। क्यों थे? क्यों की उन्होंने बम विस्फोट किया था। पर इस तर्क के आधार पर तो हर वो आदमी जो बम विस्फोट करता है आतंकवादी होना चहिए फिर आजकल के आतंकवादियों की फांसी माफ़ी के लिए प्रदर्शन क्यों? उन की फांसी का समर्थन करने वाली विचारधारा इनकी फांसी का विरोध क्यों करती है?
 दरअसल छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी जब भी इतिहास लेखन करते है तो अपने पितृ पुरुष की किताब पढ़ते है। जवाहर लाल नेहरू की भारत एक ख़ोज। और वामपंथी अपने पितृ पुरुष काल मार्क्स की किताबे। अब इन किताबो में जो कुछ भी लिखा हुआ है वो सब अटल सत्य है। इस के आलावा समाज में जो कुछ भी है। उस को भी इन किताबो के अनुसार ही संशोधित करने का प्रयास किया जाता है। और फिर भी वो चीज समझ में ना आये तो उसको नकार दो। ख़ारिज कर दो। अंधविश्वास, पाखंड, कुरीति, ब्राहमणवाद, मनुवाद, आडम्बरवाद, सांप्रदायिक जैसे शब्दों से उस चीज को अप्रसांगिक बना दो।

 एक झूठ को 100 बार, हजार बार बोलो, पीढ़ी दर पीढ़ी बोलो लोग सच मानने लगेंगे। और लोग मान भी रहे है। जैसे की भारत के  राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी है। ये बात हर कोई जानता है हमारे पाठ्यक्रम में भी है, पर संविधान में राष्ट्रपिता का कोई पद नहीं है। किसी कानून के जरिये भी उन्हें ये उपाधि नहीं दी गई ये बात कितने लोग जानते है? स्कूली बच्चो के पाठ्यक्रम में भी झूठ? आखिर क्यों?  70 सालो में हम अपनी खुद की शिक्षा प्रणाली तक नहीं बना पाए। ब्रिटिश कालीन शिक्षा प्रणाली आज भी हमें मानसिक गुलाम बनाये हुए है। अंतर सिर्फ ये है की पहले अंग्रेज थे अब वामपंथी है। 

1 comment:

  1. Sir, aap kis vichaardhaara ko follow karate hai, meri to ak hi vichar dhara hai 'BHARAT Mata KI JAY'
    Ab Gandhiji ko lekar koi fayda nahi, bal ur jayega, pet dhas jayega, jins shirt utarjayega firbhi aap unaku vichar dhara nahi badal sakate

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