कोई कितना भी बड़ा बुधिजीबी हो तर्कवादी हो या उदारवादी जिनके लिए इस
देश में सिर्फ और सिर्फ बीजेपी ही नफरत फैलाती है, हिन्दू-मुस्लिम करती है जातिवाद
की राजनीती करती है, हिन्दुत्व के नाम पर देश को बर्बाद कर दिया इन 6 सालों में,
बस अब खुश? 6 साल पहले देश बहुत खुशहाल था, देश जन्नत बन चूका था सभी लोग फ़रिश्ते थे।
प्यार और अमन की नदिया बह रही थी, बस अब और ज्यादा खुश? कांग्रेसी-वामपंथी-कथित
उदारवादी-तर्कवादी बुद्धिजीवी बेचारे 6 साल से अपनी परिवारवाद की वंशवाद की
दुकानों को बंद होते देख-देख कर खून के आसूं रो रहे है। इनकी ख़ुशी के लिए उपरोक्त
पंक्तियाँ काफी है। वर्ना मेरे लेख से तो इन्हें और जलन ही होनी है।
जो आकडे मैं लिखने वाला हूँ उनके आधार पर सिर्फ एक ही सवाल है मेरे मन
मैं जिसका अगर कोई ढंग का जवाब मिल जाए तो इनकी सारी बाते मान लूँ। मैं मान जाऊंगा
की बीजेपी झूठ बोल कर लोगो को मुर्ख बना कर सत्ता में आई है। ये आकडे अभी हाल ही
में गृहमंत्री अमित शाह ने संसद के अन्दर प्रस्तुत किए है। कुछ लोग
(कांग्रेसी-वामपंथी-कथित उदारवादी-तर्कवादी बुद्धिजीवी) यही कहेंगे की ये आकडे
झूठे है, और अगर सच में ये बात है तो इन लोगो के पास स्वर्णिम अवसर है। अमित शाह
को पद से हटाने का, उन्हें जेल भेजने का और मोदी सरकार को भी माफ़ी मंगवाने का। आप
अपने सारे सच्चे सबुत ले कर सर्वोच न्यायलय में केस कर दीजिए। वकीलों की भी कोई
कमी नहीं है, और धन की भी जिस दिन न्यायधीश आपके सबूतों और दलीलों से सहमत हो
जाएँगे तो अमित शाह को संसद के अन्दर झूठ बोलने के लिए पद छोड़ना पड़ेगा और जेल भी
जाना पड़ेगा। एक सांसद और मंत्री का संसद के अन्दर झूठ बोलना एक अपराध है संविधान
के अनुसार और सर्वोच्च न्यायलय उस झूठे को जेल भी भेज सकती है, पर आप साबित करे की
ये आकडे झूठे है। खैर ये आकडे पूरी तरह सच्चे है क्यों की इन्हें भारत की जनता
द्वारा लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुई पूर्ण बहुमत वाली सरकार के गृहमंत्री ने
संसद के अन्दर रखा है। किसी के पास अगर कोई और आकडे है, वो भी इतने मजबूत आधार के
साथ तो कृपया करके न्यायलय ने जा सकते है। कांग्रेस पार्टी के आईटी सेल द्वारा
फर्जी आकड़ों की फोटोशोप तस्वीरे, अदालत में काम नहीं आती। तो इन आकड़ों पर नजर
डालते है। 1947 भारतीय भू भाग में तीन हिस्से हुए। भारत, पूर्वी पाकिस्तान और
पश्चिमी पाकिस्तान, जो मुस्लिम देश घोषित किया गया. मुस्लिम समुदाय को उनकी मांगों
के अनुरूप उनकी देशभक्ति स्वतंत्रता आन्दोलन में उनकी हिस्सेदारी आदी के कारण धर्म
के आधार पर देश टुकड़ों में बंट गया। 1971 पूर्वी पाकिस्तान फिर से एक अलग देश बना।
ये भी मुस्लिम देश ही घोषित किया गया। भारत के अन्दर हिन्दू बहुसंख्यक है,
अल्पसंख्यको में आते है मुस्लिम, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और अन्य। पाकिस्तान और
बांग्लादेश में मुस्लिम बहुसंख्यक है और अल्पसंख्यक में आते है हिन्दू जिनमे सिख
बौद्ध जैन आदि सब शामिल है। 1947 में पाकिस्तान में 23% अल्पसंख्यक थे, 2011 में
3.7% रह गए। बांग्लादेश में 22% अल्पसंख्यक थे जो 7.8% रह गए। वही भारत में सिर्फ
मुस्लिम अल्प्संखयक 9.8% थे जो अब 14.23% हो गए, भारत में हिन्दू 84% थे जो 79% रह
गए। आकडे अभी और भी है पर मेरा सवाल ये है की इस पूरे भू भाग में
(भारत-पाकिस्तान-बाग्लादेश) ऐसा कौन सा प्लेग, या जीवाणु, या विषाणु, महामारी,
चेचक, या फिर कोई जलवायु परिवर्तन, सुनामी, प्राक्रतिक या मानव जनित आपदा आ गई थी
जिसने चुन चुन कर सिर्फ एक ही धर्म विशेष (मुस्लिम) की आबादी को तो बढ़ने दिया,
बाकि सब धर्मो की आबादी घटती रही। यहाँ तक की भारत में भी। कोई बुद्धिजीवी इसको
अल्ह्हा का कहर बोल दे तो अलग बात है जिसने गैरमुस्लिमो को सजा दी। वर्ना मुझे
समझाए ऐसा कैसे हो सकता है। बोला जा सकता है की हिन्दुओ (जिसमे सभी शामिल है) का
जीवन स्तर सुधरा, वो आधुनिक बने, परिवार नियोजन को अपनाया, जन्मदर कम हुई, पर
अच्छे जीवन स्तर से जन्मदर कम होती है तो मृत्युदर भी तो कम होती है। और फिर ये
आधुनिकता उच्च जीवन स्तर मुस्लिमो ने क्यों नहीं अपनाया? मान लेते है की भारत में
मुस्लिमो पर अत्याचार होते थे। तो भी पाकिस्तान बाग्लादेश में तो जीवनस्तर सुधारा
जा सकता था। भारत में हिन्दुओ का जीवनस्तर अच्छा हुआ तो यहाँ अल्पसंख्यकों की भी
आबादी बढ़ी, इस हिसाब से पाकिस्तान बांग्लादेश के मुस्लिम बहुसंख्यक भी आधुनिक जीवन
अपनाते तो वहाँ के अल्पसंख्यको की आबादी भी बढती? क्यों ?? पर आकडे हमारे सामने
है, बेकार के अगर मगर से कुछ नहीं होने वाला जो सच है वो सामने है और मेरा सवाल भी
की ऐसा क्या हो गया की सिर्फ एक ही समुदाय की आबादी बढती रही, और बाकि सभी समुदायों
की आबादी घटती चली गई। पिछले 70 सालो में
?
जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक़ देश में हिंदुओं
की आबादी 96.63 करोड़ है, जो कि कुल जनसंख्या का 79.8 फ़ीसद है.
वहीं मुसलमानों की आबादी 17.22 करोड़ है, जो कि जनसंख्या का 14.23 फ़ीसद होता
है. ईसाइयों की आबादी 2.78 करोड़ है, जो कि कुल जनसंख्या का 2.3 फ़ीसद और
सिखों की आबादी 2.08 करोड़ (2.16 फ़ीसद) और बौद्धों की आबादी 0.84 करोड़ (0.7
फ़ीसद) है. पारसी समुदाय की आबादी 57,264 थी। 2001 की गणना अनुसार पारसी समुदाय का
जनसँख्या प्रतिशत 0.06 फीसदी था। वहीं 29 लाख लोगों ने जनगणना में अपने धर्म का
जिक्र नहीं किया. पिछले एक दशक में जनसंख्या 17.7 फ़ीसद की दर से बढ़ी है. पर
किसकी ? एक समुदाय को छोड़ कर सभी समुदायों की आबादी तो कम हो रही है। समाचार
एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ 2001 से 2011 के बीच मुसलमानों की आबादी 0.8 फ़ीसद बढ़ी
हैं तो हिंदुओं की आबादी में 0.7 फ़ीसद की कमी दर्ज की गई. देश में साल 2001 से
2011 के बीच पारसी समुदाय की आबादी में 18 फीसदी की कमी आयी है। पारसी समुदाय के
सबसे ज्यादा लोग (9727) गुजरात में रहते हैं, जबकि दिल्ली में
महज 221 लोग निवास करते हैं।
भारत
के गृह मंत्रालय ने दिनांक 12.1.1978 की परिकल्पना के तहत अल्पसंख्यक आयोग की
स्थापना की। 1984 में कुछ समय के लिए अल्पसंख्यक आयोग को गृह म़ंत्रालय से अलग कर
दिया गया तथा कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत नए रूप में गठित किया गया। कल्याण
मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 23 अक्टूबर 1993 को अधिसूचना जारी कर अल्पसंख्यक
समुदायों के तौर पर पांच धार्मिक समुदाय यथा मुस्लिम, ईसाई, सिख,
बौद्ध
तथा पारसी समुदायों को शामिल किया गया 27 जनवरी 2014 को केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय
अल्पसंख्यक आयोग कानून 1992 की धारा 2 के अनुच्छेद (ग) के तहत जैन समुदाय को
भी अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में शामिल किया। आप जानते ही है की इस आयोग का क्या
काम है। भारत के अल्पसंख्यको यथा मुस्लिम, ईसाई,
सिख,
बौद्ध,पारसी
तथा जैन समुदायों के अधिकारों की रक्षा करना। प्रथम अध्यक्ष न्यायमूर्ति मोहम्मद
सरदार अली खान (1993-1996) थे
फिर
अब्दुल रहमान अन्तुले, सलमान खुर्शीद, के रहमान खान, नजमा हेपतुल्ला और अब मुख्तार
अब्बास नकवी। क्या आप को नहीं लगता की राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष का
पद मुस्लिम समुदाय के लिए आरक्षित है? इतने सालों में ईसाई, सिख, बौद्ध,पारसी
तथा जैन समुदायों से कोई भी योग्य व्यक्ति नहीं मिला? उन्हें भी हक है या नहीं। क्या
वो अल्पसंख्यक नहीं है? सच पूछा जाए तो भारत में असली अल्पसंख्यक पारसी समुदाय
है(0.06%)से भी कम, फिर क्रमश:जैन(0.37%), बौद्ध(0.70%), सिख(1.72%)और ईसाई(2.30%)
है। जिन्हें अल्पसंख्यको के हक मिलने चाहिए। मुस्लिम समाज इस देश का दूसरा सबसे
बड़ा बहुसंख्यक समुदाय है क्यों की वो 10% से कम के मानक को पार कर चूका है।
कुछ
लोग चीख-चीख कर कहते है की मुस्लिम आबादी बढ़ जाएगी तो क्या होंगा? क्यों उन्हें
पता नहीं है की आबादी बढती है तो क्या होता है ? आर्थिक संसाधनों पर कितना जोर
पड़ता है, देश की विकास दर और अर्थव्यवस्था पर कितना बोझ पड़ता है, भूखमरी, गरीबी,
बेरोजगारी, और फिर महंगाई। अब जबकि सभी समुदाय जनसँख्या कम कर रहे है तो मुस्लिम
समुदाय को ही अपनी आबादी क्यों बढ़ानी है? उन्हें जनसँख्या बढ़ाने की नहीं बल्कि जो
है उसका विकास करने की जरुरत है, आधुनिकता का मार्ग अपनाने की जरुरत है, अपने जीवन
स्तर को ऊपर उठाने की जरुरत है, जैसे दुसरे समुदाय कर रहे है। अगर इस देश के संविधान
ने आप को अधिकार दिए है तो जिम्मेदारियां भी दी है। और अब वक़्त है उन
जिम्मेदारियों को पूरा करने का। अपने बच्चो को स्कूल में भेजे मदरसे में नहीं तभी
आधुनिकता का मार्ग प्रशस्त होंगा। अब वक़्त है इस देश का दूसरा सबसे बड़ा समुदाय बन
कर असली अल्पसंख्यको को उनके अधिकार दिलवाने में मदद करेने का।
No comments:
Post a Comment