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Friday, April 8, 2016

भारत राष्ट्र- दुर्दशा की कहानी



भारत राष्ट्र- दुर्दशा की कहानी


पुराने समय की बात है . एक परिवार था . काफी सम्पन्न और ख़ुशहाल. इस परिवार की मुखिया थी  भारती और घर का नाम था “भारत भवन” . इस के चार बेटे थे जिनके नाम थे , ब्राह्मण कुमार, छत्रिय कुमार, वैश्य कुमार और शूद्र कुमार. ब्राह्मण कुमार की जिम्मेदारी थी घर के सदस्यों को पढ़ाना, और संस्कार देना.  घर की सुरक्षा का दायित्व छत्रिय कुमार का था . घर के भरण पोषण की जिम्मेदारी वैश्य कुमार की थी और शूद्र कुमार सबसे छोटा होने के कारण सब का  लाड़ला था वो घर के कामों मैं  हाथ बटाता था . दूर-दूर तक इस परिवार की यश गाथा कही और सुनी जाती थी . एक दिन अचानक एक मेहमान आया ,जिसका नाम था मियाँ.  बेहद गरीब और दुखी. भारती जो “अतिथि देवों भव:” में विश्वास रखती थी. उस ने उस अतिथि का खूब आदर सत्कार किया , इतना प्यार और अपनापन पा कर वो अतिथि बहुत खुश हुआ , इस परिवार का वैभव देख कर उस के मन में लालच आ गया . पर वो अकेला था और ये लोग इतने सारे. इस लिए सबसे पहले इस ने अपने परिजनों को भी यहाँ बुलाना शुरु कर दिया, और देखते ही देखते मियाँ और उसके परिजनों ने भारती के घर के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया .

भारती का बेटा छत्रिय कुमार ने कई बार ये बात अपने घरवालों को बताई , पर भारती जो स्वभाव से भोली थी वो “अतिथि देवों भव:” का फर्ज ही पूरा करती रही. और इस कारण बाकी बेटे भी चुप रहे .  घर का खर्च ज्यादा होने लगा था तो वैश्य कुमार को भी ज्यादा काम करना पड़ता था. काम करने वाले सदस्यों की संख्या कम और खाली बैठ कर खाने वाले  ज्यादा हो गए थे .

एक दिन मोका देख कर मियाँ ने छत्रिय कुमार पर हमला कर दिया .परन्तु वो हार गया और रोते-रोते सारा इल्जाम उसने छत्रिय कुमार के उपर ही डाल दिया . भारती जानती थी की छत्रिय कुमार मियाँ को पसंद नहीं करता इस लिए इन सब ने मियाँ की बातों पर भरोसा कर लिया . फिर मियाँ छत्रिय कुमार के पास गया और उसको अपने भाइयों के खिलाफ भड़काया . छत्रिय कुमार क्यों की सब से नाराज था. इस लिए वो भी मियाँ की बातों मैं आ गया . कुछ दोनों के बाद मियाँ ब्राह्मण कुमार से लड़ गया.  छत्रिय कुमार ये सब देख कर भी चुप रहा. इस कारण दोनों भाइयों मैं मतभेद हो गए .

मियाँ का सिलसिला चलता रहा . कभी वो एक से लड़ता तो कभी दूसरे से , कभी प्यार तो कभी मार , कभी समझाना तो कभी भड़काना , और आखिर कार वो चारों भाई एक दूसरे से अलग-अलग हो गए . सब आपस मैं लड़ने लगे . सबसे कमजोर हालत थी शूद्र कुमार की , क्यों की उस के पास ना धन था ना  ही ताकत और न ज्ञान .

घर के 70 फीसदी हिस्से पर अब मियाँ और उसके परिजनों का कब्ज़ा था , अतिथि अब मालिक बन गया था और मालिक अपना वैभव भूल आपस मैं ही लड़ते रहते थे.  मियाँ सत्ता सुख भोग रहा था की एक दिन अचानक एक और मेहमान आ गया .

इस मेहमान का नाम था अंग्रेज कुमार . भारती ने अपने नए मेहमान का भी स्वागत किया . अंग्रेज कुमार जान गया था की इस घर मैं चल क्या रहा है . उसने मियाँ के दोस्ती कर ली और जो नफ़रत मियाँ ने चारों भाइयों मैं डाली थी वो नफ़रत उसने मियाँ के परिजनों मैं  भी डाल दी . अब मियाँ की जगह था अंग्रेज कुमार और चारों भाइयों की तरह था मियाँ का परिवार. आपसी लड़ाई, एक दूसरे को मारना पीटना , घर के एक तरफ मियाँ का परिवार लड़ता रहता था और दूसरी तरफ भारती का परिवार लड़ता रहता था. अवसर  का फायदा उठा कर अंग्रेज कुमार “भारत भवन” का मालिक बन गया .  

सब कुछ नष्ट हो चूका था , सारा वैभव, धन, यश आदि. अंग्रेज कुमार की लड़ाई, मियाँ से भी होने लगी और भारती से भी. सब अलग-अलग हो कर लड़ते, इस लिए हार जाते . भारती ये सोचती की मियाँ हमारे घर पर कब्ज़ा होने के कारण दुखी है इस लिए वो अंग्रेज कुमार से लड़ता है.  जबकि वो ये नहीं जानती थी की अंग्रेज कुमार के आने से मियाँ की सारी मेहनत बेकार हो गई थी. जो सुख वो भोग रहा था उस पर अब अंग्रेज कुमार का कब्ज़ा था.  इस लिए वो अंग्रेज कुमार का विरोध कर रहा था .अंग्रेज कुमार ने मियाँ और भारती के कुछ परिजनों से साठ-गाठ करके अपनी तरफ मिला . नतीजा ये हुआ की ये परिजन ऊपरी तौर से  मियाँ/भारती के साथ थे. जबकि अंदर ही अंदर अंग्रेज कुमार के साथ थे .लड़ाई चलती रही. राज चलता रहा. आखिर कार अंग्रेज कुमार कमजोर हो गया. उस को अब ये लगने लगा की “भारत भवन” पर अब वो अपना कब्ज़ा नहीं रख सकता. उस को जाना ही पड़ेगा पर भवन दे कर किस को जाये ? मियाँ को , जो उस के आने के वक़्त घर का मालिक था, या भारती को जो इस घर की असली मालिक है. उसने घर खली करने की घोषणा कर दी और “भारत भवन” के तीन हिस्से कर दिए गए .

एक बड़ा हिस्सा भारती के परिजनों को मिला . दो हिस्से मियाँ को दिए गए .अब क्यों की इस घर को आजाद करवाने में मियाँ के परिजनों का भी हाथ था. इस लिए भारती वाले हिस्से में मियाँ के परिजन रह सकते थे, पूरी आजादी के साथ. जबकि मियाँ के हिस्से वाले भाग में भारती के परिजन नहीं रह सकते थे .अंग्रेज कुमार का मुआवजा आज भी उसके घर पहुँच रहा है. मियाँ के परिजन भारती के परिजनों को अपने हिस्से में रहने नहीं देते. और भारती के हिस्से में मियाँ  के परिजन आराम से रह रहे है . फिर भी वो नारे लगा कर अपने लिए आजादी माँगे है. सिलसिला चल रहा है .....................................

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