मेरी किताब “आत्मा” का भाग
8 बज चके थे । सभी लोग अभी भी जंगल में कातिल या उसके किसी
सुराग की तलाशी में जुटे थे । मगर अब कोई किसी के साथ नहीं था ।
सब अलग-अलग हो चुके थे और जंगल में कितना अन्दर तक घुस चुके थे बताना मुश्किल था ।
यहाँ तक की रिया और विक्रम भी अलग हो चुके थे । रिया काफी थक गई थी , इस लिए एक
पेड़ के सहारे खड़ी हो गई और अपनी आखेँ बंद कर ली । तभी उसे लगा की कोई देख रहा है ,
फौरन आखेँ खोल दी और ? सामने वही साया था | हवा में था वो
साया | जैसे वो हवा में तैर रहा हो । चेहरे पर वैसी
ही हँसी थी जैसी मरियम का कत्ल करते वक़्त थी । रिया जोर से चीखी , और वहाँ से भागी
, तभी किसी सिपाही के चीखने की आवाज आई । उस सिपाही ने भी उस आत्मा को देखा । फिर
किसी और सिपाही की चीख सुनाई दी । फिर एक और ... और । इस के बाद तो उस जंगल में जो चीखो पुकार मचा उस का विवरण करना
मुश्किल था । हर कोई चीख रहा था किसी को वो साया हवा में नजर आ रहा था तो किसी को उलटा
लटका हुआ , किसी को सिर्फ सिर तो किसी को धड , आगे-पीछे, ऊपर -नीचे हर जगह वो
आत्मा ही नजर आ रही थी । लोग भाग रहे थे चिल्ला रहे थे । वो आत्मा हवा में से आती
और जमीन ने धस जाती, तो कभी जमीन में से निकल कर हवा में गायब हो जाती । कई बार तो
लोगों के शरीर से आर-पार हुई वो आत्मा । लेकिन सब ने उसको अलग -अलग ही देखा । दो -तीन
लोगों ने एक साथ नहीं देखा । आत्मा का ये तांडव रात 11 बजे तक चला । बदहवास से
किसी पुलिसकर्मी ने प्रधान को खबर कर दी ।
सब लोग जैसे तैसे पुलिस स्टेशन पहुंचे । हालात तो सब की एक जैसी ही थी पर सबसे
ज्यादा रिया डरी हुई थी । उस के ऊपर उस
आत्मा ने हमला भी किया था । विक्रम की तो
छाती पर ही वो आत्मा बैठ गई थी । बहुत से सिपाही घायल हुए । पर हैरानी की बात ये
थी की वो आत्मा एक साथ सब को मार सकती थी फिर
भी एक भी आदमी नहीं मरा । सब को डराया गया । जो लोग घायल हुए उन्हें वो चोट अपने डर
के कारण गिरने पड़ने से लगी थी । कुछ को उस आत्मा ने हवा में उठाया और फिर नीचे
फेंक दिया जिस के कारण उनकी हड्डी टूट गई । जब आदित्य और प्रधान वहाँ पहुँचे तो सब कुछ
मालूम चला उन्हें । रिया ने तो फौरन वापस
जाने का फैसला सुना दिया ।
काफी बहस और कहा सुनी हुई । आखिर ये तय किया गया की सब लोग
यही पर रात गुजारेंगे और सुबह सब (आदित्य, रिया और विक्रम ) वापस चले जायेंगे ।
जिसको जहां जगह मिली वो वही सो गया । रात गहराती जा रही थी और सब सोते जा रहे थे ,
प्रधान अपनी कुर्सी पर ही सो गया । विक्रम एक बेंच पर सो रहा था । रिया बहुत
ज्यादा डरी हुई थी इसलिए एक बेंच पर आदित्य रिया का सिर अपनी गोद में लिए बैठा था ।
जब तक रिया सो नहीं गई वो जाने की ही जिद करती रही । आदित्य को छोड़ अब कोई भी ऐसा
नहीं था जो जाग रहा हो । जंगल में से अजीब-अजीब सी आवाजें अभी भी आ रही थी । पर माहौल
कुछ हद तक शांत था । अगर तूफान कही था तो आदित्य के दिमाग में । इस सब की मनोदशा देख
आदित्य का दिमाग अलग ही उलझन में आ गया था
। हजारों सवाल उस के मन में , उमड़ रहे थे । बाकी पुलिसवालों का वो यकीन ना भी करता
पर रिया और विक्रम ? वो कभी झूठ नहीं बोल सकते ! क्या सच में कोई आत्मा थी जो ये कत्ल
कर रही थी ? वो इस बात पर यकीन कर लेता तभी उस के जेहन में वो लोहे की तार , माचिस
की तीली आदि सबूत नाच गए । आखिर भूत के
पास अद्भुत शक्तियां होती है तो वो किसी को इस तरह से क्यों मारेगा । डिसूजा की
वसीयत आदित्य पढ़ चूका था । इस परिवार का
इतिहास भी ज्यादा अच्छा नहीं था । संभव है पीटर या राजदीप ने प्रोपर्टी के लालच
में ये सब किया हो ? जब वो किसी इंसान द्वारा हत्या की बात स्वीकार करता तो आज जो
कुछ भी हुआ , उन सवालों के जवाब उस के पास नहीं होते , और अगर आत्मा द्वारा हत्या
की बात स्वीकार करता तो कत्ल के तरीके और वो सरे सबूत उस के जेहन में कोंध जाते ।
आखिर क्या चल रहा था कंसोली में ? यही सब सोचते-सोचते सुबह हो गई और जैसे की उसने
वादा किया था कंसोली से वापस जाने का तो अब वो वक़्त आ गया ।
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